Bhilai ki Patrika, बीआईटी दुर्ग के प्रोफेसरों और शोधार्थियों की टीम ने एक बार फिर देश भर में अपनी प्रतिभा साबित की है। उन्होंने आंवला की छाल से एक नैनोकण विकसित किया है, जो पानी में यूरेनियम के प्रदूषण और प्रतिकूल प्रभावों को दूर करने में असरकारक है। बीआईटी में किए गए शोध को भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) द्वारा अनुमोदित किया गया है। अब इसके पेटेंट करने की तैयार की जा रही है।
बीआईटी के पर्यावरण विभाग के अध्यक्ष डॉ. संतोष सार ने कहा कि 2018 में भारत सरकार के भाभा परमाणु केंद्र के परमाणु ऊर्जा विभाग से एक परियोजना प्राप्त हुई थी। इसे राष्ट्रीय यूरेनियम परियोजना कहा गया था।
इस परियोजना का उद्देश्य पूरे देश में यूरेनियम का ब्लू प्रिंट तैयार करना था। जब इस विषय पर शोध शुरू किया गया तो पता चला कि दुर्ग जिले के औरी, राजनांदगांव जिले के बोदल, बालोद जिले के देवतराई और कवरधा जिले के राका गांव के पानी में यूरेनियम तत्व मौजूद है ।
इस पानी में यूरेनियम की मात्रा 60 भाग प्रति बिलियन (पीपीबी) है। इस पानी को पीने से ग्रामीणों को सांस लेने में दिक्कत होने के साथ-साथ किडनी पर भी बुरा असर पड़ रहा था। इसके बाद यहां के भूजल की 14 मानकों पर जांच की गई। यहां पानी में यूरेनियम की मात्रा की जांच की गई।
शोधकर्ताओं के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती पानी से यूरेनियम के नकारात्मक प्रभावों को खत्म करना था। शोध के दौरान यह पाया गया कि आंवले की छाल से बने नैनोपार्टिकल्स आकार में बहुत छोटे होते हैं और पानी में जल्दी घुल जाते हैं। इससे यूरेनियम के नकारात्मक प्रभावों को आसानी से दूर किया जा सकता है।
यह फॉर्मूला 90 फीसदी कारगर बताया जा रहा है
पानी में यूरेनियम की मात्रा को अलग करने के लिए आंवले की छाल का इस्तेमाल किया गया है। शोधकर्ताओं ने बताया कि इसमें आयरन जैसे तत्व सही मात्रा मे पाए जाते हैं। लोहे के संपर्क में आने पर, यूरेनियम तेजी से प्रतिक्रिया करना शुरू कर देता है। इससे जल का पृष्ठीय क्षेत्रफल बढ़ जाता है। इसकी हाइड्रोजन सांद्रता सामान्य हो जाती है।
यह जैव-अवशोषक 25 मिमी प्रति लीटर, 28 डिग्री पर कमरे का तापमान बनाए रखने में 90 प्रतिशत प्रभावी पाया गया है। इसका आकार 12 नैनोमीटर है। इस वजह से यह पानी में जल्दी और बड़ी मात्रा में घुल जाता है। इसे पीने से शरीर में मेटाबॉलिक एक्टिविटी होती है और विषैले तत्व बाहर निकल जाते हैं।
इसमें चार शोधार्थियों ने सहयोग किया
स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय के सहयोग से इस परियोजना पर काम शुरू किया गया था। इधर चार शोधकर्ता पूनम देशमुख, विजेता दीवान, मनोज जिंदल और मेघा साहू ने इस पर बहुत अच्छा काम किया है। उन्होंने पानी में यूरेनियम की सांद्रता, इसके निर्धारण, विकिरण, जैव-अवशोषक, गैर विषैले रसायनों आदि पर काम किया।
इसकी मदद से आंवले की छाल से पानी से यूरेनियम निकालने के लिए नैनोपार्टिकल्स बनाए गए। छत्तीसगढ़ की शोधकर्ता पूनम देशमुख ने जैव-अवशोषक, गैर विषैले रसायनों को मिलाकर नैनोकणों का निर्माण किया।


