भिलाई की पत्रिका न्यूज़ : ये कहानी है हरीश की, एक ऐसे इंसान की, जो पिछले 11 सालों से अपने बिस्तर पर एक जिंदा लाश बनकर लेटा है। एक मां की आरज़ू है कि उसके बेटे को मौत आ जाए, मगर मौत है कि इंतज़ार करने को कह रही है। दिल्ली से सटे गाजियाबाद के एक अपार्टमेंट में, हरीश का तीन कमरों का घर है, जहां उसके माता-पिता अशोक राणा और निर्मला देवी, और छोटा भाई आशीष रहते हैं। एक कमरे में हरीश अपनी तकलीफों के साथ बिस्तर पर पड़ा है।
शुरुआत और दुर्घटना
हरीश एक सामान्य और खुशहाल जीवन जी रहा था। 2013 में, उसने चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की। एक दिन, पीजी के चौथी मंजिल से नीचे गिरने की वजह से उसकी जिंदगी बदल गई। सिर में गंभीर चोटें आईं और वो बेहोशी की हालत में चला गया। उसके परिवार ने हर संभव कोशिश की, लेकिन किसी अस्पताल में कोई सुधार नहीं हुआ।बेटे की देखभाल करते करते माँ बाप बूढ़े हो गये |
परिवार की जद्दोजहद
अशोक राणा, जो एक कैटरिंग सर्विस कंपनी में काम करते थे, जहा उन्हें 28 हजार सेलेरी मिला करती थी | अपनी सारी जमापूंजी बेटे के इलाज में लगा चुके हैं। हरीश की देखभाल के लिए एक नर्स रखी गई थी, जिसका खर्च भी बहुत ज्यादा था। उसे महीने के 27 हजार देने पड़ते थे |
नौकरी से रिटायर होने के बाद, अशोक ने सैंडविच और स्प्राउट बेचना शुरू किया ताकि घर का खर्चा चल सके। मजबूरन उसे नौकरी से हटाना पड़ा और दोनों हरीश की देखभाल करने लगे | अपना घर भी बेच दिया ताकि हरीश का ईलाज करा सके |
जीवन की जगह एक दर्दनाक इंतजार
हरीश की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ और वह धीरे धीरे एक कंकाल बन गया। उसकी मां ने अदालत का दरवाजा खटखटाया, इच्छामृत्यु की मांग करते हुए। लेकिन अदालत ने संविधान का हवाला देते हुए उनकी मांग ठुकरा दी।
अदालत का फैसला
हमारा कानून जिंदा लोगों को मौत की सज़ा देता है, मगर जिंदा लाश को मरने की इजाजत नहीं देता। अदालत ने हरीश की मां की दलील को ठुकरा दिया। अब हरीश की मौत या जिंदगी का फैसला सुप्रीम कोर्ट करेगा।
उम्मीद और निराशा के बीच
हरीश की मां और पूरा परिवार अब यही सोच रहा है कि कब तक उन्हें अपने बेटे की इस हालत के साथ जीना होगा। 11 साल बीत चुके हैं, और आगे का इंतजार कैसा होगा, यह सिर्फ वक्त ही बताएगा।
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