डॉक्टर विशेष चौधरी के अनुसार, यह बीमारी बेहद दुर्लभ है और लाखों में एक बार ही ऐसा मामला देखने को मिलता है। इन बच्चों का वजन लगभग डेढ़ किलो के आसपास है। दुर्भाग्यवश, इस बीमारी में बच्चों की त्वचा बेहद कठोर हो जाती है, मानो प्लास्टिक की एक मोटी परत से ढकी हो। ऐसे बच्चो की जीवित रहने की संभावना बेहद कम होती है|
इसे "हार्लेक्विन-टाइप इचिथोसिस" कहा जाता है। इस बीमारी में बच्चे की त्वचा और आँखें सही से विकसित नहीं हो पातीं और उसकी मृत्यु दर लगभग 50% होती है। डॉक्टरों ने बताया कि इनके माता-पिता के जीन में किसी गड़बड़ी के कारण यह बीमारी होती है।पैदा हुए बच्चो में एक की आँख की जगह पर त्वचा ने कवर किया हुआ है |
महिलाओं और पुरुषों के शरीर में 23-23 क्रोमोसोम होते हैं। यदि दोनों में किसी संक्रमण के कारण गड़बड़ी हो, तो यह बीमारी बच्चे में आ सकती है। इस बीमारी के कारण बच्चों की त्वचा की परत धीरे-धीरे फटने लगती है, जो असहनीय दर्द का कारण बनता है।
कई मामलों में ऐसे बच्चे 10 दिनों के भीतर इस कठोर परत को छोड़ देते हैं। केवल 10% बच्चों के ही पूरी तरह से ठीक होने की संभावना होती है, लेकिन उन्हें जीवनभर त्वचा की गंभीर समस्याओं से जूझना पड़ता है। कल तक जिस परिवार में बच्चो के पैदा होने की उत्सुकता बनी हुई थी आज वहां सन्नाटा पसरा हुआ है | परिवार समझ नहीं पा रहा है की वह खुशियाँ मनाये या दुःख ? परिवार की आर्थिक स्तिथि बेहद कमजोर है| ऐसे में माता पिता
के सामने बच्चों के ईलाज की चुनौती खड़ी हो गयी है |बच्चो को देखकर रिश्तेदार भी उन्हें पकड़ने में डर रहे है|

