CG : (महिला दिवस विशेष ) खुली आंखों से दुनिया नहीं देखी, लेकिन सपनों की उड़ान बड़ी थी – दृष्टिहीनता को मात देकर जज बनीं यवनिका....

भिलाई की पत्रिका न्यूज़ : रायपुर। सपनों को हकीकत में बदलने का जज़्बा हो तो कोई भी बाधा रास्ता नहीं रोक सकती। यह साबित किया है यवनिका ने, जो जन्म से ही दृष्टिहीन हैं लेकिन उन्होंने इसे कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। हिदायतुल्लाह नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (HNLU), नवा रायपुर की पूर्व छात्रा यवनिका ने दिल्ली न्यायिक सेवा परीक्षा उत्तीर्ण कर जज बनने का गौरव हासिल किया है। संभवतः वह पहली दृष्टिहीन महिला हैं जिन्होंने यह मुकाम हासिल किया।

संघर्ष और हौसले की अनोखी कहानी

यवनिका का कहना है, "दृष्टिबाधिता मेरे लिए हमेशा एक चुनौती रही, लेकिन मैंने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। दूसरों की तरह मैं भी सामान्य जीवन जीती रही, बस मेरे करने का तरीका अलग था।"

दिल्ली की रहने वाली यवनिका ने रायपुर से एलएलबी और बेंगलुरु से एलएलएम किया। उनकी मेहनत और लगन का ही नतीजा था कि उन्होंने HNLU में पढ़ाई के दौरान दो गोल्ड मेडल भी हासिल किए।

माता-पिता बने ताकत

यवनिका अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता को देती हैं। उनकी मां प्रोमिला सिंह और पिता कुलदीप सिंह हमेशा उनके साथ खड़े रहे। प्रोमिला सिंह, जो पहले एक स्कूल में टीचर थीं, अपनी बेटी की पढ़ाई को प्राथमिकता देते हुए अपनी नौकरी तक छोड़ दी। उन्होंने विशेष शिक्षा (स्पेशल बीएड) प्राप्त की ताकि अपनी बेटी का बेहतर मार्गदर्शन कर सकें। HNLU प्रशासन ने भी सहयोग किया और यवनिका व उनकी मां को अलग क्वार्टर दिया, जिससे उनकी पढ़ाई में कोई बाधा न आए। बेंगलुरु में एलएलएम के दौरान भी उनकी मां को साथ रहने की अनुमति दी गई।

कठिनाइयों को बनाया ताकत

पढ़ाई के दौरान यवनिका को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उनके लिए ब्रेल लिपि में नोट्स तैयार करना आसान नहीं था। उन्हें स्वयं ब्रेल लिपि में नोट्स टाइप करने पड़ते थे, जिससे उनकी पढ़ाई का समय बढ़ जाता था। उन्होंने ऑनलाइन सामग्री, ऑडियो और पीडीएफ की मदद से अपनी तैयारी पूरी की।

न्यायालय से मिली विशेष अनुमति

यवनिका को सबसे बड़ी चुनौती तब मिली जब परीक्षा के प्रश्नपत्र को लेकर दिक्कत आई। उन्हें यह चिंता थी कि बड़े-बड़े प्रश्नों को पढ़ने में कठिनाई होगी। कानून के अनुसार, कोई भी उम्मीदवार उस भाषा में परीक्षा दे सकता है जिसे वह जानता हो। यवनिका ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर ब्रेल लिपि में प्रश्नपत्र की मांग की, जिसे स्वीकार कर लिया गया। यह पहली बार था जब किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र ब्रेल लिपि में जारी किया गया। इसके अलावा, उनके लिए कंप्यूटर में विशेष सॉफ्टवेयर इंस्टॉल किया गया और एक आईटी विशेषज्ञ को उनकी सहायता के लिए नियुक्त किया गया।

नकारात्मकता को किया अनदेखा

जब यवनिका ने कानून की पढ़ाई करने की इच्छा जताई, तो कई लोगों ने उन्हें हतोत्साहित किया। कुछ ने कहा कि वह सफल नहीं हो पाएंगी, तो कुछ ने सवाल उठाया कि बिना देखे वह जज कैसे बन सकेंगी। लेकिन उन्होंने इन सब बातों को नजरअंदाज कर दिया और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती रहीं। जब उन्होंने परीक्षा में शानदार प्रदर्शन किया, तो वही लोग जिन्होंने संदेह जताया था, उनकी सराहना करने लगे।

एक बार एक जज से बातचीत के दौरान भी उन्हें यह सुनने को मिला था कि वह जज नहीं बन पाएंगी। लेकिन यवनिका ने इस टिप्पणी को अपनी प्रेरणा बना लिया और अपने सपने को साकार कर दिखाया।

मिसाल बनीं यवनिका

यवनिका की यह उपलब्धि न केवल उनके लिए बल्कि उन सभी के लिए प्रेरणा है जो किसी भी प्रकार की शारीरिक चुनौती से जूझ रहे हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी बाधा सफलता की राह में नहीं आ सकती। उनकी कहानी संघर्ष, साहस और अटूट विश्वास का प्रतीक बन चुकी है।

भिलाई की पत्रिका न्यूज़ के whatsup ग्रुप से जुड़ने के लिए लिंक पर क्लिक कर ज्वाइन करे |

https://chat.whatsapp.com/IOVoH6eNnBa5TB0nClVjXi