EMI का जाल: एक परिवार की 30 दिनों की लड़ाई (Part 2)
सड़क के किनारे खड़े अमित के कान में अभी भी बैंक के रिलेशनशिप मैनेजर की वह सख्त आवाज़ गूंज रही थी। "शाम 5 बजे तक..." यह सिर्फ एक समयसीमा नहीं थी, बल्कि उसकी सालभर की इज्जत, उसके परिवार के सुकून और उसकी बनाई हुई उस दुनिया की आखिरी साँसें थीं जो उसने तिनका-तिनका जोड़कर खड़ी की थी। हवा में एक अजीब सी उमस थी, भिलाई की इस दोपहरी में धूप इतनी तीखी थी कि उसकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा था। उसने अपनी जेब में हाथ डाला, तो उसका फोन लगातार कांप रहा था—कभी किसी नए ईमेल के साथ, तो कभी किसी और बैंक के ऑटोमैटिक रिमाइंडर मैसेज के साथ।
उसके पैर आगे नहीं बढ़ रहे थे। ऑफिस महज़ दो सौ मीटर दूर था, लेकिन वह रास्ता उसे किसी खौफनाक रास्ते जैसा लग रहा था। जहाँ हर कदम पर एक नया सवाल, एक नया डर उसका इंतज़ार कर रहा था। अगर आज शाम तक बैंक की किस्त नहीं गई, तो उसका सिबिल स्कोर (CIBIL Score) क्रैश हो जाएगा। और अगर सिबिल गिरा, तो भविष्य में कभी कोई इमरजेंसी लोन मिलना नामुमकिन हो जाएगा।
क्या वह किसी दोस्त को फोन मिलाए? किससे मांगे? आज के दौर में पैसे मांगना किसी से अपनी इज्जत नीलाम करने जैसा है। हर कोई अपनी उलझनों में फंसा है।
अमित ने गहरी सांस ली, अपने चेहरे पर जबरदस्ती एक आम इंसान की शांत दिखने वाली परत चढ़ाई और ऑफिस के गेट की तरफ कदम बढ़ा दिए।
कार्यालय की ठंडी हवा भी अमित के भीतर सुलग रही आग को शांत नहीं कर पा रही थी। वह अपनी डेस्क पर बैठा था, सामने कंप्यूटर की स्क्रीन पर स्प्रेडशीट खुली थी, जिसमें कंपनी के आंकड़े चमक रहे थे, लेकिन उसकी नज़रें सिर्फ शून्य में टिकी थीं।
"अमित भाई, कल वाले प्रोजेक्ट का डेटा भेजा क्या?" उसके सहकर्मी आलोक ने उसकी टेबल पर फाइल रखते हुए पूछा।
अमित चौंक गया। उसने हड़बड़ाते हुए कहा, "हूँ... हाँ आलोक, बस... अभी भेज रहा हूँ। थोड़ा सिस्टम स्लो चल रहा है।"
आलोक बिना कुछ कहे अपनी सीट पर लौट गया। लेकिन अमित अंदर से टूट चुका था। घड़ी की सुइयां जैसे रेंग रही थीं। दोपहर के 1:30 बज चुके थे। उसके बैंक खाते में कुल जमा राशि मात्र ₹432 थी, और ईएमआई की कुल मांग ₹24,000 से ऊपर की थी।
तभी उसके फोन की स्क्रीन पर एक नोटिफिकेशन चमका। यह किसी लोन एप्लीकेशन (Instant Loan App) का विज्ञापन था— "बिना किसी कागजी कार्रवाई के 5 मिनट में ₹50,000 तक का लोन सीधे बैंक खाते में!"
यह विज्ञापन किसी प्यासे को रेगिस्तान में पानी के झरने जैसा लगा। कुछ महीने पहले तक अमित ऐसे विज्ञापनों को एक सिरे से खारिज कर देता था। वह जानता था कि इन ऐप्स के ब्याज दरें कितनी खतरनाक होती हैं। लेकिन आज, जब डूबते को तिनके का सहारा चाहिए होता है, तो इंसान यह भूल जाता है कि वो तिनका नहीं, बल्कि लोहे की सुई है जो हाथ को चीर देगी।
अमित की उंगलियाँ खुद-ब-खुद उस ऐप के डाउनलोड लिंक पर चली गईं। उसके दिल की धड़कनें तेज हो गई थीं। एक अजीब सी सिहरन उसके पूरे शरीर में दौड़ रही थी। क्या वह सच में इस दलदल में पैर रखने जा रहा था? क्या वह एक कर्ज को चुकाने के लिए दूसरा, उससे भी खतरनाक कर्ज लेने जा रहा था?
"नहीं... नहीं, यह गलती मत करो," उसके भीतर की ज़मीर ने आवाज़ दी। लेकिन तुरंत ही दूसरे कोने से एक व्यावहारिक डर ने जवाब दिया— "अगर आज बैंक का ईसीएस बाउंस हुआ, तो समाज में जो नाक कटेगी, उसका क्या? मीरा को क्या जवाब दोगे?
फैसला हो चुका था। मजबूरी ने विवेक को हरा दिया था।
अमित ने ऐप खोला। आधार कार्ड, पैन कार्ड, बैंक स्टेटमेंट और सेल्फी—डिजिटल दुनिया ने उसकी प्राइवेसी को एक झटके में निगल लिया। दस मिनट के भीतर उसके फोन पर एक और नोटिफिकेशन आया— "Congratulations! Rs 30,000 has been credited to your account."
स्क्रीन पर हरे रंग में लिखा हुआ 'सक्सेस' मैसेज देखकर अमित को एक पल के लिए ऐसा लगा मानो उसे जन्नत मिल गई हो। उसके माथे पर जमा पसीना सूख गया। उसने तुरंत बैंक ऐप खोला और पैसे ट्रांसफर कर दिए। कुछ ही मिनटों में मैसेज आ गया— "EMI Paid Successfully."
उसने गहरी राहत की सांस ली। उसके कंधे से जैसे कोई बहुत बड़ा पहाड़ हट गया हो। उसे लगा कि उसने जंग जीत ली है। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और कुर्सी की पीठ से सिर टिका दिया। कुछ पलों के लिए उसे दुनिया की हर मुसीबत टलती हुई महसूस हुई।
शाम को जब वह ऑफिस से घर लौट रहा था, तो भिलाई की सड़कों की रौनक उसे कुछ अलग ही लग रही थी। ढलता हुआ सूरज, सड़कों पर भागती गाड़ियां, ठेले पर चाट खा रहे लोग—सब कुछ सामान्य लग रहा था। उसे लगा कि कल तक जो आफत सिर पर मंडरा रही थी, वह टल चुकी है।
घर पहुंचते ही मीरा ने मुस्कुराते हुए पानी का गिलास आगे बढ़ाया।
"आज बड़े सुकून में लग रहे हो? ऑफिस का काम समय पर पूरा हो गया क्या?" मीरा ने पूछा, उसके चेहरे पर एक सहज घरेलू चमक थी।
अमित ने पानी का गिलास लिया और एक ही सांस में पूरा पी गया। उसने मीरा की आँखों में देखा और एक हल्की मुस्कान के साथ झूठ बोला, "हाँ मीरा, थोड़ा तनाव था, लेकिन अब सब ठीक है। बैंक का काम भी सुलझ गया है।"
मीरा ने चैन की सांस ली। "चलो भगवान का शुक्र है। मैं तो डर गई थी जब सुबह तुमने बैंक वाली बात पर कुछ नहीं कहा था।"
बच्चे अपने कमरे में होमवर्क कर रहे थे। घर में रसोई से मसालों की महक आ रही थी। सब कुछ कितना शांत और खूबसूरत लग रहा था। अमित ने अपने आप से कहा— "देखा, सब संभल गया। डरना फालतू था।"
लेकिन वह यह नहीं जानता था कि यह सुकून सिर्फ एक दिखावा था। वह शांत पानी के ऊपर तैरती हुई उस सुंदर चादर की तरह था, जिसके ठीक नीचे एक विशाल मगरमच्छ मुंह खोले बैठा था।
रात के ठीक 11:30 बजे। पूरा घर गहरी नींद में था। अचानक अमित के फोन की लाइट जली। कोई आवाज नहीं थी, सिर्फ वाइब्रेशन से तकिया हिल गया था।
अमित की आँखें झटके से खुलीं। उसने डरते हुए फोन उठाया। स्क्रीन पर उस लोन ऐप से एक मैसेज चमक रहा था— "Reminder: Your repayment of Rs 35,000 (Principal + Heavy Interest) is due in just 7 days. Failure to pay will result in your contacts list being accessed and legal action."
अमित का खून एक पल के लिए जम गया। उसके कान सुन्न हो गए। उसने मैसेज को दोबारा पढ़ा। उसने 30,000 लिए थे, और सिर्फ 7 दिनों में उसे 35,000 चुकाने थे? और अगर वह नहीं चुका पाया, तो उसके फोन की कॉन्टैक्ट लिस्ट—यानी उसके ऑफिस के बॉस, उसके रिश्तेदार, उसकी पत्नी और दोस्तों के पास उसके कर्जदार होने के संदेश चले जाएंगे!
कमरे का तापमान अचानक उसे बहुत ठंडा लगने लगा। पसीने से उसकी पीठ भीग चुकी थी। उसने मुड़कर मीरा को देखा जो बेफिक्र होकर सो रही थी। उसे महसूस हुआ कि उसने अपनी समस्या को हल नहीं किया था, बल्कि एक छोटे से गड्ढे से कूदकर सीधे एक गहरी खाई में छलांग लगा दी थी।
सात दिन... बस सात दिन बचे थे उसके पास। क्या वह इस नए और भयानक जाल से निकल पाएगा? क्या उसका परिवार इस डिजिटल ब्लैकमेलिंग के तूफान को झेल पाएगा?
अमित ने कांपते हाथों से फोन को वापस तकिए के नीचे रखा और अपनी दोनों हथेलियों से अपना चेहरा ढक लिया। अंधेरे कमरे में उसकी सिसकियाँ हवा में घुल गई थीं, जिन्हें सुनने वाला सिवाय उस खामोश रात के और कोई नहीं था।
(अगले भाग में: अमित के फोन पर आया वह पहला फोन कॉल, जिसने उसकी दुनिया हिला दी...)



