भिलाई की पत्रिका न्यूज़ : छत्तीसगढ़ में पहली बार इजिप्शियन गिद्ध पर ट्रैकिंग डिवाइस लगाया गया है। इस डिवाइस के माध्यम से यह पता लगाया जा सकेगा कि यह पक्षी कहां-कहां जाता है। इससे गिद्ध के अनुकूल पर्यावरण और उसकी गतिविधियों का अध्ययन करके उसके संरक्षण में मदद मिलेगी।
रायपुर के नंदनवन जंगल सफारी में इस गिद्ध का उपचार किया गया था। मंगलवार को इसे ठीक होने के बाद खुले आसमान में छोड़ा गया। इसके शरीर पर सोलर चार्जिंग तकनीक वाला एक ट्रांसमीटर लगाया गया है, जो स्वयं चार्ज होकर आवश्यक डेटा अधिकारियों को भेजेगा।
घायल गिद्ध का इलाज और रिहाई
यह गिद्ध 6 जून को रायपुर-बिलासपुर हाईवे पर घायल अवस्था में मिला था। इसे डिहाइड्रेशन की समस्या थी और काफी कमजोर हो चुका था। रायपुर स्थित नंदनवन जंगल सफारी में इसका इलाज किया गया। ठीक होने के बाद इसे प्राकृतिक आवास में लौटने के लिए छोड़ दिया गया।
ट्रैकिंग का उद्देश्य
नंदनवन जंगल सफारी के निदेशक डीएफओ धम्मशील गणवीर ने बताया कि इस ट्रैकिंग के जरिए गिद्ध के प्रवास, घोंसले बनाने के स्थान और संभावित खतरों का डेटा जुटाया जाएगा। इस अध्ययन के लिए वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) के साथ मिलकर काम किया गया है। इसके लिए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की आवश्यक अनुमति भी प्राप्त की गई।
विशेषज्ञों की भूमिका
इस टैगिंग प्रक्रिया में मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) सतोविषा समाजदार, पशु चिकित्सक डॉ. राकेश वर्मा और WII के वैज्ञानिक डॉ. आर. सुरेश कुमार ने योगदान दिया।
गिद्धों की घटती संख्या
छत्तीसगढ़ में गिद्धों की संख्या में कमी आई है। इससे पहले नंदनवन जंगल सफारी में हिमालयन ग्रिफॉन, सिनेरेस वल्चर और व्हाइट-रंप्ड वल्चर जैसे गिद्धों का भी रेस्क्यू किया गया है। वन विभाग गिद्धों के संरक्षण के लिए विभिन्न शोध और प्रयास कर रहा है।
इजिप्शियन गिद्ध की विशेषताएं
इजिप्शियन गिद्ध आकार में बाज के समान होता है और यह गिद्धों की प्रजाति में सबसे छोटा है। यह गिद्ध सर्दियों में मध्य एशिया और पूर्वी यूरोप से राजस्थान पहुंचता है और फिर अन्य राज्यों में प्रवास करता है।
यह पक्षी 5,000 किमी से भी अधिक दूरी तय कर सकता है। प्राचीन मिस्र की सभ्यता में इसका विशेष महत्व था, जिस कारण इसे "इजिप्शियन वल्चर" कहा जाता है। यह पक्षी मध्य एशिया के उज्बेकिस्तान और पूर्वी यूरोप के बुल्गारिया में प्रजनन करता है। एक समय में यह गिद्ध उत्तर भारत, पाकिस्तान और नेपाल में आमतौर पर पाया जाता था, लेकिन अब इसे संकटग्रस्त घोषित कर दिया गया है।
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