भिलाई की पत्रिका न्यूज़ : रायपुर: भारत विविधता से भरा देश है, जहां आज भी कई जनजातियां अपनी सदियों पुरानी परंपराओं को संजोए हुए हैं। कुछ जनजातियां आधुनिक जीवनशैली अपना चुकी हैं, लेकिन कई समुदाय अब भी जंगलों के बीच प्रकृति के सहारे पारंपरिक जीवन जीते हैं। ऐसी ही छत्तीसगढ़ की एक जनजाति है, जिसकी परंपराएं बेहद अनोखी और चौंकाने वाली हैं।
भुंजिया जनजाति: एक विशेष आदिवासी समुदाय
छत्तीसगढ़ की भुंजिया (Bhunjia) जनजाति को एक विशेष पिछड़ी जनजाति के रूप में जाना जाता है। इनका रहन-सहन, खानपान और खास तौर पर रसोई के प्रति इनका नजरिया काफी अलग है। इस जनजाति की महिलाएं अपनी रसोई को इतना पवित्र मानती हैं कि यदि कोई बाहरी व्यक्ति उसे छू भी ले, तो वे पूरे किचन को ध्वस्त कर देती हैं और उसकी मिट्टी तक फेंक देती हैं। इस पवित्र रसोई को वे 'किचन' नहीं, बल्कि 'लाल बंगला' (Lal Bangla) के नाम से पुकारती हैं।
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पुरुषों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित
लाल बंगला में पुरुषों का जाना पूरी तरह निषेध है। यहां तक कि अगर कोई पुरुष या बाहरी व्यक्ति इस रसोई को छू ले, तो महिलाएं इसे तोड़ देती हैं और नए सिरे से इसका निर्माण करती हैं। इस परंपरा की जड़ें त्रेता युग से जुड़ी एक मान्यता में मिलती हैं।
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रामायण से जुड़ी धार्मिक मान्यता
भुंजिया जनजाति की मान्यता है कि जिस क्षेत्र में वे रहते हैं, वहीं भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास के दौरान ठहरे थे। इसी दौरान रावण भोजन मांगने के बहाने माता सीता का हरण कर ले गया। यह घटना जब स्थानीय लोगों को पता चली, तो पुरुषों में यह डर घर कर गया कि कहीं उनकी पत्नियों के साथ भी ऐसा न हो जाए, क्योंकि वे उन्हें अकेला छोड़ जंगल लकड़ी लेने जाते थे।
इस घटना के बाद से महिलाओं ने रसोई की पवित्रता को सर्वोच्च मानते हुए इसमें बाहरी व्यक्ति के प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगा दी। हालांकि धार्मिक कथाओं के अनुसार रावण ने माता सीता को सुरक्षा घेरे से बाहर बुलाकर छलपूर्वक उनका अपहरण किया था।
लाल बंगला का निर्माण और उसकी प्रक्रिया
भुंजिया समाज में लाल बंगला का निर्माण एक विशेष प्रक्रिया के तहत होता है। यह रसोई घर घर के बाहर लाल मिट्टी से बनाया जाता है। इसका निर्माण पुरुष करते हैं, लेकिन खास बात यह है कि निर्माण से पहले वे उपवास रखते हैं और जंगल से लकड़ी व बांस काटने से पूर्व 'प्रकृति देवी' से क्षमा याचना करते हैं।
निर्माण पूरा होने के बाद इसकी देखरेख केवल महिलाएं करती हैं और इसमें किसी भी बाहरी व्यक्ति का प्रवेश पूर्णतः निषिद्ध होता है। यदि कोई अनजाने में भी इस पवित्र स्थान को छू ले, तो पूरा लाल बंगला तोड़कर दोबारा नए सिरे से बनाया जाता है।
मासिक धर्म के बाद ही मिलती है एंट्री
इस जनजाति की परंपरा के अनुसार लड़कियों को ‘लाल बंगला’ में तभी प्रवेश की अनुमति मिलती है, जब उनके पीरियड्स शुरू हो जाते हैं। इस मान्यता के पीछे यह सोच है कि तभी वे पूर्ण रूप से महिला मानी जाती हैं और रसोई की पवित्रता को संभालने के योग्य बनती हैं।
पहनावे और शारीरिक श्रृंगार में विशेष नियम
भुंजिया समाज की महिलाएं ब्लाउज और पेटीकोट का उपयोग नहीं करतीं। वे केवल साड़ी पहनती हैं। यहां नाक छिदवाने की अनुमति नहीं होती, जबकि कान छिदवाना पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए परंपरा का हिस्सा है।
संस्कृति की पहचान बना 'लाल बंगला'
भुंजिया जनजाति छत्तीसगढ़ के महासमुंद और गरियाबंद जिलों के दूरस्थ गांवों में निवास करती है। करीब 25 गांवों में फैले इस समुदाय की जनसंख्या लगभग 10,000 है। ‘लाल बंगला’ जैसी अनूठी परंपराएं न केवल उनकी सांस्कृतिक पहचान को दर्शाती हैं, बल्कि उनके धार्मिक विश्वास और प्रकृति से जुड़ाव को भी उजागर करती हैं। जब देश की कई जनजातियां आधुनिकता की ओर बढ़ रही हैं, भुंजिया समुदाय अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण रखने का उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।
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