दुर्ग दादी-पोती हत्याकांड: हत्यारों को पकड़ने पुलिस ने पॉलीग्राफिक टेस्ट का लिया सहारा , संदिग्ध आरोपियों का कराएगी पॉलीग्राफिक टेस्ट ,कोर्ट से ली अनुमति...

भिलाई की पत्रिका न्यूज़ : दुर्ग जिले के गनियारी गांव में चार महीने पहले दादी और पोती की निर्मम हत्या का मामला अब तक अनसुलझा है। इस केस को सुलझाने के लिए पुलिस ने अब पॉलीग्राफिक टेस्ट का सहारा लेने का फैसला किया है। पुलिस ने इसके लिए अदालत से अनुमति भी प्राप्त कर ली है और जल्द ही आगे की प्रक्रिया शुरू करेगी।

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पॉलिग्राफिक टेस्ट की तैयारी

दुर्ग एसपी जितेंद्र शुक्ला ने बताया कि गनियारी गांव में हुई इस जघन्य हत्या के मामले में पुलिस संदेहियों का पॉलीग्राफिक टेस्ट कराने जा रही है। यह दूसरा ऐसा मामला है जिसमें दुर्ग पुलिस ने संदिग्ध आरोपियों का पॉलीग्राफिक टेस्ट कराने का निर्णय लिया है। इससे पहले पाटन क्षेत्र के बहुचर्चित खुड़मुडा हत्याकांड में भी इसी प्रक्रिया का सहारा लिया गया था।

सबूतों की कमी

एसपी जितेंद्र शुक्ला ने बताया कि पुलिस आरोपियों तक लगभग पहुंच चुकी है, लेकिन उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं होने के कारण उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सका है। इसीलिए पुलिस ने पॉलीग्राफिक टेस्ट कराने का निर्णय लिया है। न्यायालय से अनुमति मिल जाने के बाद अब पुलिस इस प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ा रही है। यदि पॉलीग्राफिक टेस्ट के बाद भी पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलते हैं, तो पुलिस संदिग्धों का नार्को टेस्ट भी कराने पर विचार करेगी।

हत्याकांड का विवरण

7 मार्च 2024 को गनियारी गांव में 62 वर्षीय राजवती साहू और उनकी 17 वर्षीय पोती सविता साहू की उनके घर में खून से लथपथ लाशें मिली थीं। अज्ञात आरोपियों ने उनकी निर्मम हत्या कर दी थी। इस मामले की जांच में पुलिस ने हजारों कॉल डिटेल खंगाले, सैकड़ों लोगों से पूछताछ की और सीसीटीवी फुटेज की जांच की, लेकिन अब तक कोई ठोस सबूत नहीं मिल सका है। पुलिस ने इस मामले में चार संदिग्धों को हिरासत में भी लिया था, लेकिन सबूतों के अभाव में उन्हें छोड़ना पड़ा।

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इनाम की घोषणा

पूरी जांच के बाद भी आरोपियों को पकड़ने में असफल रहने पर आईजी दुर्ग रामगोपाल गर्ग ने 25 हजार रुपए के इनाम की घोषणा की। इसके बाद एसपी जितेंद्र शुक्ला ने भी आरोपी के बारे में जानकारी देने वाले को 10 हजार रुपए इनाम देने की घोषणा की है।

एसपी जितेंद्र शुक्ला ने कहा कि उम्मीद है कि इस टेस्ट के बाद अगले महीने इस मामले का खुलासा हो जाएगा। पुलिस की टीम अब पूरी तन्मयता से इस मामले को सुलझाने में जुटी हुई है और न्याय की उम्मीद अभी भी बरकरार है।

क्या होता है पॉलीग्राफ टेस्ट -  अपराध की गुत्थी सुलझाने का तकनीकी सहारा

पॉलीग्राफ, जिसे झूठ पकड़ने वाली मशीन या लाई डिटेक्टर के नाम से भी जाना जाता है, एक ऐसी मशीन है जिसका प्रयोग खासतौर पर अपराध का पता लगाने के लिए किया जाता है। यह तकनीक कई मौकों पर सफल साबित हुई है, लेकिन इसके बावजूद कुछ वैज्ञानिक शोधों में पाया गया है कि कुछ लोग इस टेस्ट को भी धोखा देने में कामयाब हो जाते हैं।

भारत में पॉलीग्राफ टेस्ट का उपयोग

भारत में पॉलीग्राफ टेस्ट का उपयोग करने से पहले अदालत से अनुमति लेना आवश्यक है। इस तकनीक का कई मामलों में सफलतापूर्वक उपयोग किया जा चुका है, खासकर जब अपराध की गुत्थी सुलझाने की बात आती है। 

पॉलीग्राफ टेस्ट कैसे काम करता है?

पॉलीग्राफ टेस्ट के दौरान यह पता लगाया जाता है कि व्यक्ति सच बोल रहा है या झूठ। इसके लिए व्यक्ति के हृदयगति, रक्तचाप और अन्य शारीरिक प्रतिक्रियाओं को मापा जाता है। जब व्यक्ति झूठ बोलता है, तो इन तत्वों में बदलाव आता है। इसके अलावा, एड्रेनालाईन हार्मोन के कारण भी शरीर में बदलाव होता है, जिसे मशीन दर्ज करती है।जिनमे उनकी सांस की गति ब्लड प्रेसर, व्यक्ति का पल्स ,शरीर से निकलने वाले पसीने को व हाथ पैरों की मूमेंट को मेजर किया जाता है|

टेस्ट की प्रक्रिया

1. **शारीरिक माप**: व्यक्ति के शरीर से पॉलीग्राफ मशीन को जोड़ा जाता है। यह मशीन हृदयगति, रक्तचाप और मस्तिष्क के सिग्नल्स को मापती है।

2. **प्रश्न पूछना**: एक प्रश्नकर्ता व्यक्ति से प्रश्न पूछता है। यदि व्यक्ति झूठ बोलता है, तो उसके मस्तिष्क से P300 (P3) सिग्नल निकलता है और हृदयगति व रक्तचाप बढ़ जाता है। 

3. **डेटा संग्रहण**: इन सभी मापों को कंप्यूटर में दर्ज कर लिया जाता है। 

 उदाहरण -यदि किसी व्यक्ति ने अपराध नहीं किया है लेकिन वह अपराध के बारे में कुछ जानता है, तो भी उसके मस्तिष्क से विशेष सिग्नल निकलेगा। इससे प्रश्नकर्ता को यह पता चल जाएगा कि व्यक्ति कुछ जानता है। दूसरी ओर, यदि व्यक्ति अपराध के बारे में कुछ नहीं जानता है, तो उसके मस्तिष्क से विशेष सिग्नल नहीं निकलेगा|

पॉलीग्राफ टेस्ट अपराध की गुत्थी सुलझाने में एक महत्वपूर्ण उपकरण हो सकता है। यह तकनीक कई मामलों में उपयोगी साबित हुई है, लेकिन इसे पूर्णतः विश्वसनीय नहीं माना जा सकता क्योंकि कुछ लोग इस टेस्ट को धोखा देने में भी सफल हो सकते हैं। बावजूद इसके, भारत में इसका उपयोग न्यायिक प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण सहारा बन चुका है।

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