निजामडीह गांव में रहने वाले अमर सिंह अपने परिवार के साथ साधारण जीवन जी रहे थे। रोज मजदूरी कर वह अपनी पत्नी और सात बेटियों का पेट पालते थे। लेकिन जिंदगी ने अचानक करवट ली, जब उनकी पत्नी बीमार रहने लगी। इलाज के दौरान पता चला कि उन्हें ब्रेन ट्यूमर है। लंबे समय तक इस बीमारी से जूझने के बाद तीन महीने पहले उनकी पत्नी ने दम तोड़ दिया
मां के जाने के बाद घर में अमर सिंह और उनकी सात बेटियां रह गईं, जिनकी उम्र महज 8 महीने से लेकर 12 साल तक है। अब घर में बच्चों का ख्याल रखने वाला कोई नहीं है। खाना बनाना, समय पर खिलाना और छोटी बच्चियों की देखभाल—सब कुछ अधूरा रह जाता है।
अमर सिंह रोज मजदूरी करने जाते हैं, क्योंकि यही उनकी रोजी-रोटी का एकमात्र सहारा है। लेकिन जैसे ही वह काम पर निकलते हैं, सातों बेटियां घर में अकेली रह जाती हैं। गांव वालों का कहना है कि मां के जाने के बाद बच्चियों के चेहरे की मुस्कान भी कहीं खो गई है।
हालांकि गांव की महिला समूह की महिलाएं समय-समय पर आकर बच्चियों की देखरेख करती हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, खासकर 8 महीने की सबसे छोटी बच्ची को सबसे ज्यादा देखभाल की जरूरत है, लेकिन पिता के घर से बाहर रहने पर स्थिति संभालना मुश्किल हो जाता है।
इस मामले में जिला पंचायत सीईओ प्रेम कुमार पटेल ने बताया कि प्रशासन को इस परिवार की जानकारी मिल चुकी है। योजना के तहत समूह की महिलाओं को बच्चियों की देखभाल के लिए लगाया गया है और हर संभव मदद करने की बात कही गई है।
अमर सिंह के लिए यह स्थिति किसी बड़े संघर्ष से कम नहीं है। एक तरफ परिवार का पेट पालने की जिम्मेदारी है, तो दूसरी तरफ अपनी नन्ही बेटियों को अकेला छोड़ने का दर्द। अब उन्हें प्रशासन से ही उम्मीद है कि उनकी बच्चियों की परवरिश में कोई कमी नहीं आएगी।
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ऑफिस से लौटते हुए राहुल ने जैसे ही कमरे का दरवाज़ा खोला,
उसे वही पुरानी घुटन महसूस हुई—एक छोटा सा कमरा,
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रात के करीब 11:30 बजे थे।
बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। कमरे में सिर्फ एक ट्यूबलाइट..
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