कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ऐतिहासिक दस्तावेज और साहित्य यह साबित करते हैं कि यह स्थान परमार वंश के राजा भोज से जुड़ा संस्कृत शिक्षा केंद्र था, जिसे भोजशाला के नाम से जाना जाता था। अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट और वैज्ञानिक तथ्यों को भी अहम आधार माना।
हाईकोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि यह स्थल वाग्देवी मंदिर है या कमाल मौला मस्जिद। अदालत ने कहा कि ASI की रिपोर्ट और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर यह साफ होता है कि यह संरक्षित स्मारक है और इसकी निगरानी व संरक्षण का अधिकार ASI के पास रहेगा।
अदालत ने मुस्लिम पक्ष को मस्जिद की जमीन के लिए आवेदन करने का विकल्प खुला रखा है। कोर्ट ने अयोध्या मामले में स्थापित कानूनी सिद्धांतों और संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का भी जिक्र किया। अदालत ने कहा कि बहु-विषयक वैज्ञानिक अध्ययन और पुरातात्विक साक्ष्यों पर भरोसा किया जा सकता है।
फैसले के समय शुक्रवार होने की वजह से भोजशाला परिसर में नमाज भी अदा की गई। भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच शांतिपूर्ण तरीके से नमाज पूरी हुई। प्रशासन पहले से अलर्ट मोड पर था।
फैसले से पहले शहर के कई इलाकों में नाकाबंदी की गई थी। सोशल मीडिया पर भी लगातार नजर रखी जा रही थी। करीब 1000 से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे। प्रशासन ने दोनों पक्षों से चर्चा कर शांति बनाए रखने की अपील की थी। कुछ अराजक तत्वों पर कार्रवाई भी की गई।
हाईकोर्ट के आदेश पर ASI ने 22 मार्च 2024 से लेकर जून 2024 तक करीब 98 दिनों तक वैज्ञानिक सर्वे किया था। इसके बाद 15 जुलाई 2024 को लगभग 2000 पन्नों की रिपोर्ट कोर्ट में सौंपी गई। रिपोर्ट में दावा किया गया कि मौजूदा ढांचे में पहले से मौजूद मंदिर के अवशेषों और स्तंभों का इस्तेमाल किया गया था। सर्वे में परमार काल की मूर्तियां, नक्काशीदार पत्थर और शिलालेख भी मिलने की बात कही गई।
भोजशाला विवाद कई दशकों से चर्चा में रहा है, लेकिन 2022 में ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ की याचिका के बाद मामला तेजी से आगे बढ़ा। ASI के 2003 के आदेश के मुताबिक हिंदू समुदाय को मंगलवार को पूजा और मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार दोपहर नमाज की अनुमति दी जाती रही है। बाकी दिनों में यह स्थल पर्यटकों के लिए खुला रहता है।
इस मामले में हिंदू, मुस्लिम और जैन पक्ष ने अपनी-अपनी दलीलें कोर्ट के सामने रखीं। हिंदू पक्ष ने इसे राजा भोज द्वारा निर्मित सरस्वती मंदिर और गुरुकुल बताया। मुस्लिम पक्ष ने इसे सदियों पुरानी कमाल मौला मस्जिद बताया और ASI रिपोर्ट पर सवाल उठाए। वहीं जैन समाज ने दावा किया कि यह मूल रूप से जैन गुरुकुल और मंदिर था।
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