शनिवार को महानदी जल विवाद ट्रिब्यूनल के सामने नदी में पानी की उपलब्धता को लेकर यह संयुक्त तकनीकी रिपोर्ट पेश की गई। विशेषज्ञ इसे वर्षों पुराने विवाद के समाधान की दिशा में एक बड़ा और अहम कदम मान रहे हैं।
इससे पहले 20 अप्रैल को ट्रिब्यूनल ने दोनों राज्यों को सख्त चेतावनी दी थी। कहा गया था कि विवाद सुलझाने के लिए यह आखिरी मौका है, वरना ट्रिब्यूनल गुण-दोष के आधार पर फैसला लेने के लिए मजबूर होगा।
अब जब दोनों राज्यों ने मिलकर रिपोर्ट पेश की, तो ट्रिब्यूनल ने भी इस पहल की सराहना की। साथ ही मामले की अगली सुनवाई 30 मई को तय की गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कई मुद्दों पर दोनों राज्यों के बीच सहमति बन चुकी है। बाकी बचे मतभेदों को भी सुलझाने के प्रयास जारी हैं, जिससे विवाद खत्म होने की उम्मीद और मजबूत हो गई है।
अगर विवाद की जड़ को समझें, तो महानदी छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले से निकलती है और ओडिशा होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिलती है। यह क्षेत्र की एक बेहद अहम नदी है और साल 2016 से इसके पानी के बंटवारे को लेकर दोनों राज्यों के बीच टकराव जारी है।
ओडिशा का कहना है कि छत्तीसगढ़ ने नदी किनारे कम से कम आठ बैराज बनाए हैं, जिससे मानसून छोड़ बाकी समय में पानी का बहाव प्रभावित हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, महानदी का कुल जलग्रहण क्षेत्र 1,41,600 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें 45.73% हिस्सा ओडिशा, 53.9% छत्तीसगढ़ और छोटा हिस्सा मध्य प्रदेश में आता है।
वहीं छत्तीसगढ़ का तर्क है कि नदी का बड़ा हिस्सा उसके राज्य में आता है, इसलिए पानी का उपयोग करना उसका अधिकार है। साथ ही यह भी कहा गया कि ओडिशा ने ऊपरी हिस्से में बिना जानकारी दिए कई प्रोजेक्ट शुरू किए थे।
विवाद सुलझाने की कोशिशें साल 2016 से जारी हैं, जब केंद्र ने त्रिपक्षीय बैठक कराई थी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और फिर 2018 में ट्रिब्यूनल का गठन किया गया।
साल 2024 में ओडिशा में सरकार बदलने के बाद इस मामले में रुख भी बदला। वहीं 2025 में ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को पत्र लिखकर समाधान का प्रस्ताव दिया, जिस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया भी मिली।
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ऑफिस से लौटते हुए राहुल ने जैसे ही कमरे का दरवाज़ा खोला,
उसे वही पुरानी घुटन महसूस हुई—एक छोटा सा कमरा,
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रात के करीब 11:30 बजे थे।
बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। कमरे में सिर्फ एक ट्यूबलाइट..
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