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महीने के आखिर में खाली हो जाती है जेब? अपनाएं ये आसान बचत नियम, सैलरी खत्म होने की टेंशन होगी दूर!

भिलाई की पत्रिका न्यूज़ : हर महीने सैलरी आने के बाद कुछ दिनों तक सब सामान्य लगता है, लेकिन जैसे-जैसे महीने का आखिरी हफ्ता करीब आता है, जेब और बैंक बैलेंस दोनों हल्के पड़ने लगते हैं। कई लोग अच्छी कमाई के बावजूद महीने के अंत तक आर्थिक दबाव महसूस करने लगते हैं।

असल वजह सिर्फ कम आय नहीं, बल्कि बिना योजना के होने वाले खर्च और वित्तीय अनुशासन की कमी भी है। छोटे-छोटे खर्च, अचानक की गई खरीदारी और बचत को टालने की आदत धीरे-धीरे पूरे बजट को बिगाड़ देती है।

महीने के आखिर में खाली हो जाता है बटुआ, अपनाएं आसान बचत और बजट मैनेजमेंट के नियम

अधिकांश लोग यह तय ही नहीं करते कि उनकी आय का कितना हिस्सा कहां खर्च होना चाहिए। जबकि हर महीने कुछ जरूरी खर्च तय होते हैं, जैसे मकान किराया, राशन, पेट्रोल, बिजली-पानी और रोजमर्रा की जरूरतें। इन खर्चों के लिए पहले से राशि तय करने से अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण रखना आसान हो जाता है।

कई लोग महीने की शुरुआत में ही खुलकर खर्च कर देते हैं। इसका असर आखिरी दिनों में दिखाई देता है, जब आर्थिक दबाव बढ़ने लगता है। इसलिए जरूरी खर्चों के बाद बची रकम को पूरे महीने के हिसाब से हिस्सों में बांटना बेहतर माना जाता है। जैसे 01 से 10 तारीख, 11 से 20 तारीख और 21 से 30/31 तारीख तक का अलग-अलग खर्च तय करना।

अक्सर लोग सोचते हैं कि महीने के अंत में जो पैसा बचेगा, उसे बचत में डाल देंगे। लेकिन ऐसा कम ही हो पाता है। बेहतर तरीका यही है कि सैलरी मिलते ही 20 से 30 प्रतिशत राशि बचत के लिए अलग कर दी जाए। यही बचत भविष्य में आर्थिक सुरक्षा का आधार बनती है।

बीमारी या नौकरी में बदलाव जैसी परिस्थितियां अचानक आर्थिक दबाव बढ़ा सकती हैं। ऐसे समय में 3 से 6 महीने के खर्च के बराबर आपातकालीन निधि मानसिक और आर्थिक दोनों तरह की सुरक्षा देती है।

सिर्फ पैसा बचाना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे सही दिशा देना भी जरूरी है। इसलिए धीरे-धीरे निवेश की आदत विकसित करना भी फायदेमंद माना जाता है।


बचत बढ़ाने के लिए महीने में कुछ दिन ऐसे तय किए जा सकते हैं, जब केवल जरूरी चीजों पर ही खर्च किया जाए। इससे अनावश्यक खर्चों की पहचान होती है। वहीं किसी विलासिता की वस्तु को खरीदने से पहले 24 घंटे इंतजार करने की आदत भी फिजूल खर्च कम करने में मदद कर सकती है।

जरूरी खर्च, रोजमर्रा के व्यय और बचत के लिए अलग-अलग बैंक खाते रखना भी बजट को व्यवस्थित बनाए रखता है। बार-बार ऑनलाइन सामान मंगाने जैसे सुविधा खर्चों पर नियंत्रण रखना बचत बढ़ाने में मददगार हो सकता है।

हर सप्ताह एक तय नकद राशि में खर्च चलाने की कोशिश करने से सोच-समझकर पैसा खर्च करने की आदत बनती है। साथ ही हर 15 दिन में खर्चों का हिसाब देखने से समय रहते बजट को बिगड़ने से बचाया जा सकता है।

अक्सर लोग केवल किराया, राशन या बिल जैसे तय खर्चों को ही बजट में शामिल करते हैं, लेकिन रोजमर्रा के छोटे और अनियोजित खर्च धीरे-धीरे पूरे वित्तीय संतुलन को बिगाड़ देते हैं। उपहार खरीदना, फल-सब्जियों की बढ़ती कीमतें, बाहर खाना, यात्रा, मेडिकल खर्च या दफ्तर के छोटे योगदान जैसे अतिरिक्त खर्च भी जेब पर बड़ा असर डालते हैं।

ऐसे खर्चों को लगातार दो महीने तक लिखकर रखने से यह समझ आता है कि कौन-सा खर्च कितनी बार हो रहा है और उसकी अधिकतम राशि कितनी पहुंच रही है। इसके आधार पर हर महीने होने वाले औसत अतिरिक्त खर्च का अनुमान लगाया जा सकता है।

बजट बनाते समय अनियोजित खर्च के लिए अलग राशि तय करना भी जरूरी माना जाता है। इससे अचानक होने वाले खर्च नियंत्रित रहते हैं और बचत पर असर कम पड़ता है।

अगर आप भी महीने के अंत में खाली जेब की परेशानी से जूझ रहे हैं, तो इन आसान नियमों को अपनाकर अपने बजट और बचत दोनों को बेहतर बना सकते हैं।


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