मामला गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिला का है। 19 फरवरी को इस दुर्लभ सांप का रेस्क्यू किया गया। पेंड्रा के चौबेपारा में रहने वाले मजदूर महिपाल कोल के घर माचिस की डिब्बी में यह सांप बैठा मिला। बताया गया कि वह जीभ लपलपा रहा था।
द्वारिका कोल के अनुसार, यह सांप पूरी तरह से ब्लाइंड होता है और इसे ‘अधेलुआ सांप’ कहा जाता है। आकार में यह माचिस की तीली से भी पतला होता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह प्रजाति मुख्य रूप से बारबाडोस द्वीप तक सीमित मानी जाती है। हालांकि पेंड्रा क्षेत्र में यह सांप पहले भी 2-3 बार निकल चुका है।
द्वारिका कोल ने बताया कि यह इतना छोटा होता है कि एक सिक्के पर भी आ सकता है। इसकी पहचान पहली बार साल 2006 में की गई थी, जबकि यह प्रजाति पहले से मौजूद थी।
यह सांप अंधा और गैर-विषैला होता है। जमीन के नीचे रहना इसे पसंद है। आमतौर पर इसे दीमक और चींटियों के लार्वा खाते देखा जाता है।
दुर्लभ होने के कारण इसे अक्सर विलुप्ति की कगार पर माना जाता है, लेकिन शोधकर्ता समय-समय पर इसे ढूंढ निकालते हैं।
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