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दुर्ग जिला अस्पताल में युवती के एक यूनिट खून के इंतजार में जान गवांने के मामले में 7 स्टाफ जिम्मेदार, 4 बर्खास्त

भिलाई की पत्रिका न्यूज़ : दुर्ग जिला अस्पताल में लगभग 25 दिन सामने आई एक बड़ी लापरवाही ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए थे। सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित एक 20 वर्षीय युवती को समय पर सिर्फ एक यूनिट खून नहीं मिल सका और उसकी जान चली गई। अब इस मामले में स्वास्थ्य विभाग ने कार्रवाई करते हुए 2 डॉक्टरों समेत 7 लोगों को जिम्मेदार माना है, जबकि 4 कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं।

जांच रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि जिस फीमेल वार्ड में युवती भर्ती थी, वहां से ब्लड बैंक की दूरी महज 30 से 40 कदम थी। अस्पताल के ब्लड बैंक में उस समय 85 यूनिट खून उपलब्ध था, लेकिन ड्यूटी पर मौजूद किसी भी कर्मचारी ने खुद जाकर मरीज के लिए खून लाने की कोशिश नहीं की। इतना ही नहीं, डोनर उपलब्ध नहीं होने की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों तक भी नहीं पहुंचाई गई।


दुर्ग अस्पताल में लापरवाही से युवती की मौत

मामला भिलाई के मरोदा निवासी 20 वर्षीय दीपिका गाड़ा का है। दीपिका सिकल सेल एनीमिया की मरीज थी और कई दिनों से बीमार चल रही थी। परिजनों के मुताबिक उसके हाथ-पैर, कमर और पूरे शरीर में तेज दर्द था।

30 मई की रात करीब 11 बजे उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। इसके बाद परिजन उसे एम्बुलेंस से दुर्ग जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। जांच के दौरान डॉक्टरों ने बताया कि उसके शरीर में खून की मात्रा काफी कम है और तत्काल ब्लड चढ़ाने की जरूरत है।

परिजनों का आरोप है कि अस्पताल प्रशासन ने उनसे 3 यूनिट खून की व्यवस्था करने को कहा। परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था और वे तुरंत डोनर नहीं जुटा सके। उन्होंने अस्पताल और ब्लड बैंक से कम से कम एक यूनिट खून देने की गुहार लगाई ताकि इलाज शुरू हो सके, लेकिन उन्हें खून नहीं दिया गया।

परिवार का कहना है कि उन्होंने कई बार अस्पताल कर्मचारियों से मदद मांगी, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई। इलाज के दौरान 1 जून को दीपिका की मौ-त हो गई।

दीपिका की मां के अनुसार, डॉक्टरों ने बताया था कि उसकी ब्लड रिपोर्ट में हीमोग्लोबिन मात्र 5.5 ग्राम था। परिवार ने अस्पताल से अनुरोध किया था कि पहले एक यूनिट खून दे दिया जाए और बाकी की व्यवस्था बाद में कर ली जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

सिविल सर्जन डॉ. आशीषन मिंज ने भी कहा था कि ऐसी आपात स्थिति में यदि परिजन तत्काल डोनर उपलब्ध नहीं करा पाते हैं, तो परिस्थितियों को देखते हुए 1 से 2 यूनिट खून दिया जा सकता था। इसके बाद जिला प्रशासन ने पूरे मामले की जांच के लिए कमेटी गठित की।


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कलेक्टर अभिजीत सिंह द्वारा गठित दो सदस्यीय जांच टीम ने करीब 7 दिनों तक मामले की जांच की। रिपोर्ट में इलाज और ब्लड उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में कई स्तरों पर गंभीर लापरवाही सामने आई। इसके बाद 9 कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय करते हुए उन्हें नोटिस जारी किया गया था।

घटना के 25 दिन बाद स्वास्थ्य विभाग ने कार्रवाई करते हुए 2 डॉक्टरों समेत कुल 7 कर्मचारियों को दोषी माना। इनमें 4 संविदा कर्मचारियों की सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी गईं, जबकि 3 नियमित और संविदा कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के लिए उनके नियुक्तिकर्ता को पत्र भेजा गया है।

जिला कलेक्टर अभिजीत सिंह के अनुसार, रेडक्रॉस सोसायटी से नियुक्त लैब टेक्नीशियन तरन्नुम जहां और निगार परवीन की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं। वहीं एनएचएम की स्टाफ नर्स जागेश्वरी देवी और तनुजा चंद्राकर को भी नौकरी से हटा दिया गया है।

इसके अलावा नियमित स्टाफ नर्स अनसतसिया केरकेट्टा, पीजी रेजिडेंट डॉक्टर निखिल अग्रवाल और एनएचएम की विशेषज्ञ डॉक्टर डॉ. तृप्ति तिवारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए उनके नियुक्तिकर्ता को पत्र भेजा गया है।


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