जांच रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि जिस फीमेल वार्ड में युवती भर्ती थी, वहां से ब्लड बैंक की दूरी महज 30 से 40 कदम थी। अस्पताल के ब्लड बैंक में उस समय 85 यूनिट खून उपलब्ध था, लेकिन ड्यूटी पर मौजूद किसी भी कर्मचारी ने खुद जाकर मरीज के लिए खून लाने की कोशिश नहीं की। इतना ही नहीं, डोनर उपलब्ध नहीं होने की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों तक भी नहीं पहुंचाई गई।
मामला भिलाई के मरोदा निवासी 20 वर्षीय दीपिका गाड़ा का है। दीपिका सिकल सेल एनीमिया की मरीज थी और कई दिनों से बीमार चल रही थी। परिजनों के मुताबिक उसके हाथ-पैर, कमर और पूरे शरीर में तेज दर्द था।
30 मई की रात करीब 11 बजे उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। इसके बाद परिजन उसे एम्बुलेंस से दुर्ग जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। जांच के दौरान डॉक्टरों ने बताया कि उसके शरीर में खून की मात्रा काफी कम है और तत्काल ब्लड चढ़ाने की जरूरत है।
परिजनों का आरोप है कि अस्पताल प्रशासन ने उनसे 3 यूनिट खून की व्यवस्था करने को कहा। परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था और वे तुरंत डोनर नहीं जुटा सके। उन्होंने अस्पताल और ब्लड बैंक से कम से कम एक यूनिट खून देने की गुहार लगाई ताकि इलाज शुरू हो सके, लेकिन उन्हें खून नहीं दिया गया।
परिवार का कहना है कि उन्होंने कई बार अस्पताल कर्मचारियों से मदद मांगी, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई। इलाज के दौरान 1 जून को दीपिका की मौ-त हो गई।
दीपिका की मां के अनुसार, डॉक्टरों ने बताया था कि उसकी ब्लड रिपोर्ट में हीमोग्लोबिन मात्र 5.5 ग्राम था। परिवार ने अस्पताल से अनुरोध किया था कि पहले एक यूनिट खून दे दिया जाए और बाकी की व्यवस्था बाद में कर ली जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
सिविल सर्जन डॉ. आशीषन मिंज ने भी कहा था कि ऐसी आपात स्थिति में यदि परिजन तत्काल डोनर उपलब्ध नहीं करा पाते हैं, तो परिस्थितियों को देखते हुए 1 से 2 यूनिट खून दिया जा सकता था। इसके बाद जिला प्रशासन ने पूरे मामले की जांच के लिए कमेटी गठित की।
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ऑफिस से लौटते हुए राहुल ने जैसे ही कमरे का दरवाज़ा खोला,
उसे वही पुरानी घुटन महसूस हुई—एक छोटा सा कमरा,
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रात के करीब 11:30 बजे थे।
बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। कमरे में सिर्फ एक ट्यूबलाइट..
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