भिलाई की पत्रिका न्यूज़ : पितृपक्ष में पितरों के संकेतों को न करें नजरअंदाज!
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष वह समय है जब पूर्वज धरती पर अपने वंशजों का हाल-चाल देखने आते हैं। लेकिन कई बार वे संकेतों के माध्यम से यह जताते हैं कि वे प्रसन्न नहीं हैं और तर्पण या श्राद्ध की आवश्यकता है।
गरुड़ पुराण के अनुसार पितरों की नाराज़गी के 7 संकेत
कौवों का लगातार कांव-कांव करना
पितृपक्ष में अगर घर की छत या आंगन में बार-बार कौवे आकर आवाज करने लगें, तो यह संकेत है कि पितर भोजन और तर्पण की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
सपनों में पितरों का दिखना
यदि सपनों में बार-बार पूर्वज दिखाई दें और भोजन या जल मांगें, तो इसका अर्थ है कि वे तृप्त नहीं हैं और तर्पण चाहते हैं।
अचानक आर्थिक संकट आना
बिना कारण धन की हानि या आर्थिक तंगी पितरों की नाराज़गी का संकेत मानी जाती है। असंतुष्ट पितर लक्ष्मी की कृपा में बाधा डालते हैं।
लगातार बीमारियों का बढ़ना
यदि परिवार के सदस्य बार-बार बीमार पड़ने लगें और इलाज से भी आराम न मिले, तो यह भी पितरों का संकेत हो सकता है।
दीपक का अपने आप बुझ जाना
घर के मंदिर या श्राद्ध के दौरान जलाया गया दीपक अचानक बुझ जाए, तो यह पितरों के अप्रसन्न होने का संकेत है।
पूजा-पाठ में रुकावटें आना
पूजा के समय अड़चनें आना या सामग्री का गायब होना, पितरों का स्मरण कराने का तरीका हो सकता है।
तुलसी का सूख जाना
घर में तुलसी का पौधा अचानक सूखने लगे, तो इसे भी पितरों की नाराज़गी का गंभीर संकेत माना जाता है।
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क्या करें अगर दिखें ये संकेत?
धर्मशास्त्रों के अनुसार, इन संकेतों के दिखते ही पितरों को तर्पण, ब्राह्मण भोज, गौ दान और जल तर्पण करना चाहिए। इससे वे प्रसन्न होकर परिवार को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
आपका अनुभव क्या कहता है?
क्या आपने भी पितृपक्ष में ऐसे संकेत महसूस किए हैं? अपनी राय और अनुभव हमारे साथ साझा करें।
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Disclaimer: यह खबर धार्मिक मान्यताओं और गरुड़ पुराण में वर्णित कथाओं पर आधारित है। भिलाई की पत्रिका न्यूज़ इसकी पुष्टि नहीं करता।
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