भिलाई की पत्रिका न्यूज़ : पितृपक्ष का समय हिंदू धर्म में बेहद पावन माना जाता है। यह सिर्फ श्राद्ध और तर्पण का ही नहीं, बल्कि दान-पुण्य का भी सबसे बड़ा अवसर है। शास्त्रों में साफ कहा गया है कि इस पखवाड़े में सच्चे मन से किया गया दान, पितरों को तृप्त कर आशीर्वाद दिलाता है। खासकर गोदान को इतना महत्वपूर्ण बताया गया है कि यह दाता और पितरों—दोनों को मोक्ष और स्वर्ग की प्राप्ति कराता है।
गरुड़ पुराण का उल्लेख
गरुड़ पुराण, जिसे परलोक और धर्म से जुड़े सबसे प्रामाणिक ग्रंथों में गिना जाता है, उसमें स्पष्ट लिखा है कि पितरों की तृप्ति के लिए भोजन, जल और तिल का दान आवश्यक है। लेकिन सर्वोच्च दान गोदान को माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, पितृपक्ष में गाय का दान करने से पितर यमलोक से मुक्त होकर देवलोक की ओर प्रस्थान करते हैं। यही कारण है कि गोदान को "स्वर्ग की सीढ़ी" कहा गया है।
क्यों खास है गोदान?
गोदान केवल भौतिक दान नहीं, बल्कि करुणा और धर्म की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति है। गाय को शास्त्रों में सप्तलोक की द्वारपाल कहा गया है। उसके हर अंग में देवताओं और तीर्थों का वास माना गया है। इसलिए जब कोई व्यक्ति गोदान करता है, तो वह मानो सभी देवताओं को प्रसन्न कर देता है।
पितृपक्ष में गोदान का असर
पितृपक्ष में किया गया गोदान सामान्य दिनों से कई गुना अधिक फलदायी होता है। यह पितरों की आत्मा को शांति देता है, उनके अगले जन्म का बंधन तोड़ता है और दाता के पापों का नाश कर देवगति प्रदान करता है। अन्न-जल का तर्पण भले ही आम है, लेकिन गरुड़ पुराण में साफ कहा गया है कि इस काल में गोदान करना न केवल पितरों के मोक्ष का द्वार खोलता है, बल्कि स्वयं दाता को भी स्वर्ग की ओर अग्रसर कर देता है। यही कारण है कि इसे दान का सर्वोच्च रूप माना गया है।
अगर आप भी पितृपक्ष में अपने पितरों की आत्मा की शांति और उनके मोक्ष की कामना करते हैं, तो इस समय दान जरूर करें। क्योंकि यही पुण्यकर्म आपके जीवन को भी स्वर्ग की ओर ले जाने का मार्ग बना सकता है।
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है| भिलाई की पत्रिका न्यूज़ इसकी पुष्टि नहीं करता है|
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