पितृ पक्ष में क्यों खास है तोरई का पत्ता और सब्जी? जानिए धार्मिक महत्व और परंपरा..


भिलाई की पत्रिका न्यूज़ : पितृ पक्ष का आगाज हो चुका है और पूरे देश में तर्पण और श्राद्ध का दौर चल रहा है। इन 16 दिनों को पितरों की आत्मा को तृप्त करने का सबसे शुभ समय माना जाता है। इस दौरान घर-घर में पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोज की परंपरा निभाई जाती है।

पितृ पक्ष के अनुष्ठानों में एक खास परंपरा भी है – तोरई का पत्ता और तोरई की सब्जी। धार्मिक मान्यता है कि तोरई का पत्ता पितरों को भोजन अर्पित करने का सबसे शुद्ध माध्यम है।

Pitru Paksha में तोरई का पत्ता और धार्मिक महत्व

अग्नि पुराण का उल्लेख
अग्नि पुराण के अनुसार पितरों को अर्पित किया गया तोरई का भोजन सीधे उनके हिस्से में पहुंचता है। माना जाता है कि इससे पितर प्रसन्न होकर परिवार को आशीर्वाद देते हैं।

भोजन अर्पण की परंपरा
श्राद्ध में चावल, तिल और जौ जैसी सामग्री तोरई के पत्तों पर रखकर अर्पित की जाती है। यही वजह है कि इसे पवित्र माना जाता है।

लोक परंपरा और महाकोशल का रंग
महाकोशल क्षेत्र में तोरई के पत्तों पर भोग लगाने की परंपरा आज भी जीवित है। यहां श्राद्ध में तोरई की सब्जी बनाना और उसके पत्तों पर भोजन परोसना परंपरा का हिस्सा है।

पितरों की तृप्ति का विश्वास
श्राद्ध भोजन में तोरई को शामिल करने से पितरों की आत्मा तृप्त होती है और परिवार को उनका आशीर्वाद मिलता है।

इसके अलावा, पितृ पक्ष में जल और तिल से तर्पण करने का विधान है। जल को शीतलता और त्याग का प्रतीक माना जाता है, जबकि तिल सूर्य और शनि से जुड़ा है। इसी कारण इसे "देवान्न" कहा गया है और पितरों की तृप्ति के लिए अनिवार्य माना जाता है।स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध सिर्फ तीन पीढ़ियों – पितृ, पितामह और परपितामह – तक का ही होता है।

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