बस्तर में नई शुरुआत: कभी बंदूक थामने वाले हाथ अब परोसेंगे खाना, खाना बनाने-सर्व करने की ट्रेनिंग दी गई , CM साय चखा पहला स्वाद..


भिलाई की पत्रिका न्यूज़ : बस्तर में एक ऐसी पहल शुरू हुई है, जो न सिर्फ दिल छू लेती है, बल्कि उम्मीद की नई कहानी भी लिखती है। जंगलों की जंग छोड़ चुके सरेंडर नक्सली अब कैफे के ज़रिए नई जिंदगी की शुरुआत कर रहे हैं।

बस्तर में पंडुम कैफे की शुरुआत कर दी गई है, जिसका संचालन सरेंडर नक्सली और नक्सल हिंसा से प्रभावित परिवार मिलकर करेंगे। इन्हें खाना बनाने से लेकर सर्व करने और ऑर्डर लेने तक की पूरी ट्रेनिंग दी गई है। शुरुआती टीम में 13 सदस्य शामिल हैं।

                           IMAGE TITLE: पंडुम कैफे उद्घाटन – सरेंडर नक्सलियों द्वारा संचालित बस्तर के पंडुम कैफे में CM विष्णुदेव साय पहले ग्राहक बने।

17 नवंबर को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने जगदलपुर पुलिस लाइन परिसर में बने इस खास कैफे का उद्घाटन किया। उद्घाटन के दौरान CM ने खुद फूड ऑर्डर किया और सरेंडर किए नक्सलियों ने उन्हें भोजन परोसा। दिलचस्प बात यह रही कि मुख्यमंत्री ने बिल भी डिजिटल तरीके से पे किया।

कैफे की खासियत और उद्देश्य

सरकार की पुनर्वास नीति के तहत बस्तर पुलिस और प्रशासन के सहयोग से यह कैफे तैयार किया गया है। इसका स्ट्रक्चर और सेटअप शासन-प्रशासन की ओर से बनाया गया है, ताकि हिंसा की आग में झुलसे परिवारों को नया सहारा मिल सके।

कुल 13 लोगों को रोजगार मिला है—जिनमें 8 नक्सल हिंसा पीड़ित और 5 सरेंडर नक्सली हैं। इनमें 8 महिलाएं भी शामिल हैं। यह कैफे उन परिवारों के लिए आजीविका का मजबूत माध्यम बनकर सामने आया है, जो कभी हिंसा और डर के साए में जी रहे थे।

पहले ट्रेनिंग, फिर जिम्मेदारी

इन 13 लोगों को जगदलपुर में करीब एक महीने से अधिक की ट्रेनिंग दी गई। इन्हें अलग-अलग तरह के फूड आइटम तैयार करने, सर्व करने, कस्टमर से बात करने और ऑर्डर मैनेजमेंट जैसे जरूरी स्किल सिखाए गए। ट्रेनिंग पूरी करने के बाद इन सभी को कैफे की चाबी सौंपी गई।

नेताओं और अफसरों ने क्या कहा?

CM विष्णुदेव साय ने इसे “बस्तर के लिए नया अध्याय” बताया। उन्होंने कहा कि पंडुम कैफे शांति, विकास और मानवीय पुनर्वास की दिशा में बड़ी पहल है।

बस्तर IG सुंदरराज पी ने बताया कि कैफे चलाने वाले लोगों को हॉस्पिटैलिटी, फूड सेफ्टी, उद्यमिता जैसे कौशलों की ट्रेनिंग दी गई है, ताकि वे लंबे समय तक आत्मनिर्भर बन सकें।उन्होंने यह भी कहा कि “पंडुम” नाम बस्तर की सांस्कृतिक जड़ों से लिया गया है और इसकी टैगलाइन "Where every cup tells a story" क्षेत्र की उम्मीद और नई शुरुआत को दर्शाती है।

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