बताया जाता है कि वर्ष 2008 में सरस्वती शिशु मंदिर हायर सेकेंडरी स्कूल, बिर्रा की छात्रा पोराबाई को राज्य में पहला स्थान मिला था। हालांकि परिणाम घोषित होने के कुछ समय बाद ही अंकों की असामान्यता और उत्तर पुस्तिकाओं की लिखावट में अंतर को लेकर संदेह पैदा हुआ, जिसके बाद बोर्ड ने जांच बैठा दी।
आरोप था कि सुनियोजित साजिश के तहत उत्तर पुस्तिकाओं में हेरफेर कर पोराबाई को स्टेट टॉपर बनाया गया। चांपा मजिस्ट्रेट कोर्ट ने 27 दिसंबर 2020 को सभी आरोपियों को बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ 29 जुलाई 2021 को जांजगीर सेशन कोर्ट में अपील की गई।
अदालत में अतिरिक्त लोक अभियोजक केदारनाथ कश्यप ने उत्तर पुस्तिकाएं, जांच रिपोर्ट, गवाहों के बयान और बोर्ड अधिकारियों की रिपोर्ट पेश की। बचाव पक्ष ने इसे संदेह आधारित कार्रवाई बताया, लेकिन अदालत ने माना कि यह साधारण लापरवाही नहीं बल्कि संगठित साजिश थी।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इतनी बड़ी गड़बड़ी अंदरूनी मिलीभगत के बिना संभव नहीं थी। पोराबाई को मुख्य लाभार्थी और स्कूल प्राचार्य, केंद्राध्यक्ष व शिक्षक को साजिश का सक्रिय हिस्सा माना गया।
तत्कालीन माध्यमिक शिक्षा मंडल के अध्यक्ष बीकेएस रे ने बताया कि मेरिट सूची देखने के बाद वे छात्रा को सम्मानित करना चाहते थे और उसकी उत्तर पुस्तिका मंगाई। कॉपी की साफ-सुथरी लिखावट और अंग्रेजी के हाईलेवल जवाब देखकर उन्हें तुरंत फर्जीवाड़े का शक हुआ।
जांच में यह भी सामने आया कि पोराबाई का पुराना शैक्षणिक रिकॉर्ड कमजोर था और परीक्षा केंद्र से जानकारी मिली कि उसने परीक्षा दी ही नहीं थी, बल्कि उसके स्थान पर किसी और ने पेपर लिखा था। इसके बाद मामले की शिकायत दर्ज कर आरोपियों को जेल भेजा गया। बाद में सबूतों के अभाव में वे बरी हुए, लेकिन बोर्ड की अपील पर अब अदालत ने सजा सुनाई है।
करीब 18 साल बाद आए इस फैसले को न्याय की जीत बताया जा रहा है।
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