रात में लाइट बंद कर मोबाइल चलाना पड़ सकता है भारी, ग्लूकोमा बन सकता है नजर का दुश्मन,जा सकती है आंखों की रोशनी!


भिलाई की पत्रिका न्यूज़ : अगर आप भी रात को लाइट बंद कर मोबाइल चलाने की आदत रखते हैं, तो यह लापरवाही आपकी आंखों की रोशनी छीन सकती है। डॉक्टरों के मुताबिक, यही आदत ग्लूकोमा जैसी खतरनाक बीमारी को चुपचाप न्योता देती है, जिसे चिकित्सा भाषा में ‘दृष्टि का खामोश चोर’ कहा जाता है।

जनवरी माह को ग्लूकोमा अवेयरनेस मंथ के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि बदलती लाइफस्टाइल और मोबाइल पर बढ़ती निर्भरता इस गंभीर आंखों की बीमारी का खतरा तेजी से बढ़ा रही है।

अंधेरे में मोबाइल इस्तेमाल से ग्लूकोमा का खतरा, आंखों की रोशनी पर असर

मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल (वैशाली) की ऑप्थेल्मोलॉजी डायरेक्टर डॉ. रिंकी आनंद गुप्ता के अनुसार, ग्लूकोमा का सीधा संबंध आंखों के अंदर बढ़ने वाले दबाव से होता है। जब यह दबाव बढ़ता है, तो आंखों की मुख्य नस यानी ऑप्टिक नर्व धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होने लगती है।

डॉक्टरों के मुताबिक, अंधेरे कमरे में मोबाइल की तेज रोशनी आंखों पर अतिरिक्त तनाव डालती है। इससे पुतलियों पर दबाव बढ़ता है और ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचता है, जो ग्लूकोमा की वजह बन सकता है।

मोबाइल से निकलने वाली ब्लू लाइट नींद के हार्मोन मेलाटोनिन को प्रभावित करती है। नींद पूरी न होने से आंखों का प्रेशर बढ़ जाता है, जो ग्लूकोमा के मरीजों के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है।

इसके अलावा, स्क्रीन पर लंबे समय तक ध्यान लगाए रखने से पलकें कम झपकती हैं। इससे आंखें सूखने लगती हैं और आंखों का तनाव कई गुना बढ़ जाता है।

डॉक्टरों के अनुसार, 40 साल से अधिक उम्र के लोग, जिनके परिवार में पहले किसी को ग्लूकोमा रहा हो, डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर के मरीज और ज्यादा नंबर का चश्मा पहनने वाले लोग सबसे ज्यादा जोखिम में हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लूकोमा से होने वाला नुकसान स्थायी होता है। एक बार आंखों की रोशनी चली जाए, तो उसे वापस लाना संभव नहीं होता। इसलिए बचाव ही सबसे बड़ा इलाज है।

डिजिटल डिटॉक्स अपनाना जरूरी है। सोने से कम से कम एक घंटा पहले मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए। मजबूरी में फोन चलाना पड़े तो ब्राइटनेस कम रखें और नाइट मोड या ब्लू लाइट फिल्टर का इस्तेमाल करें।

डॉक्टर सलाह देते हैं कि 40 साल की उम्र के बाद साल में कम से कम एक बार आंखों के दबाव की जांच जरूर करानी चाहिए। सिरदर्द या धुंधली नजर को हल्के में न लें, यह आंखों की बड़ी चेतावनी हो सकती है।

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