भिलाई की पत्रिका न्यूज़ : छग, सुकमा बिटिया सिर्फ एक बेटी नहीं, बल्कि पूरे घर की लक्ष्मी होती है। वही घर को संवारती है, सपनों को पंख देती है। लेकिन गरीबी और अशिक्षा के कारण कई बार उसी मासूम बिटिया का बचपन छीन लिया जाता है। सुकमा जिले में भी ऐसा ही एक मामला सामने आया, जहां महज 12 साल की बच्ची की शादी कराने की तैयारी चल रही थी।
महिला एवं बाल विकास विभाग और चाइल्ड लाइन को जैसे ही इस बात की जानकारी मिली, तत्काल कलेक्टर अमित कुमार को अवगत कराया गया। कलेक्टर के निर्देश पर प्रशासन की एक टीम नक्सल प्रभावित इलाके के नाड़ीगुफा गांव के लिए रवाना की गई। जिला मुख्यालय सुकमा से निकली यह टीम घने जंगलों और नदी-नालों को पार कर गांव तक पहुंची।
गांव पहुंचते ही प्रशासन की टीम ने बच्ची के परिवार वालों को एक साथ बैठाया और पूरे मामले पर बातचीत की। स्थिति को बेहद संवेदनशीलता से संभालते हुए महिला एवं बाल विकास विभाग और चाइल्ड लाइन की टीम ने परिजनों और ग्रामीणों को बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 की जानकारी दी।
टीम ने स्पष्ट किया कि बाल विवाह न केवल कानूनन अपराध है, बल्कि इससे बच्ची के स्वास्थ्य, शिक्षा और भविष्य पर गंभीर असर पड़ता है। ग्रामीणों की मौजूदगी में पूरे मामले का विधिवत पंचनामा तैयार किया गया और बच्ची को सुरक्षित संरक्षण प्रदान किया गया।
प्रशासन की टीम ने परिवार वालों को समझाया कि बच्ची को उसका बचपन जीने दें। अगर वह पढ़ना चाहती है तो उसे पढ़ने का पूरा अवसर दें और कम उम्र में उस पर शादी का दबाव न डालें। प्रशासन की यह पहल असरदार साबित हुई और परिवार वालों ने अपनी गलती स्वीकार कर ली। उन्होंने भविष्य में ऐसी गलती दोबारा न करने का वादा किया।
जिस बच्ची की शादी जबरन कराई जा रही थी, उसकी उम्र महज 12 साल थी। प्रशासन की तत्परता से न सिर्फ उसकी शादी रुकी, बल्कि उसका बचपन भी बच गया। गांव पहुंची टीम ने सभी ग्रामीणों को भी सख्त हिदायत दी कि किसी भी नाबालिग बच्ची का विवाह कम उम्र में नहीं किया जाए और 18 साल की उम्र के बाद ही उसकी सहमति से विवाह किया जाए।
कलेक्टर अमित कुमार ने स्पष्ट कहा कि सुकमा जिले में बाल विवाह को किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। प्रशासन का उद्देश्य सिर्फ कानून लागू करना नहीं, बल्कि हर बच्चे को सुरक्षित बचपन और बेहतर भविष्य देना है। दुर्गम इलाकों में भी प्रशासनिक टीमों की सक्रियता लगातार जारी रहेगी और जिले की हर पंचायत को बाल विवाह मुक्त बनाने का संकल्प लिया गया है।
बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 के तहत 18 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों और 21 वर्ष से कम उम्र के लड़कों का विवाह कानूनन अपराध है। इस कानून में बाल विवाह रोकने, पीड़ितों को राहत देने और दोषियों को दंडित करने का प्रावधान है। बाल विवाह कराने पर दो साल तक की जेल और एक लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। यह अधिनियम 1929 के पुराने कानून का स्थान लेता है और बाल विवाह को शून्य घोषित करता है।
आंकड़ों की बात करें तो हाल के वर्षों में बाल विवाह के मामलों में गिरावट आई है। इसका बड़ा कारण बेटी पढ़ाओ बेटी बढ़ाओ जैसे अभियान, सामाजिक जागरूकता और शिक्षा के स्तर में बढ़ोतरी माना जा रहा है।
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