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दुर्लभ बीमारी से जूझ रही 3 साल की अनिका का आखिरी मौका: 13.5 किलो से पहले लगना है 9 करोड़ का इंजेक्शन, अब भी चाहिए 3.40 करोड़..

भिलाई की पत्रिका न्यूज़ : इंदौर,सिर्फ 3 साल 2 महीने की मासूम अनिका शर्मा जिंदगी की सबसे बड़ी जंग लड़ रही है। स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) टाइप-2 जैसी दुर्लभ बीमारी से जूझ रही अनिका के पास इलाज का अब आखिरी मौका बचा है। अगर उसका वजन 13.5 किलो से ऊपर चला गया, तो 9 करोड़ रुपए का इंजेक्शन लग पाना भी मुश्किल हो जाएगा।

अनिका का मौजूदा वजन 10.5 किलो है। उसकी मां सरिता शर्मा बताती हैं कि इंजेक्शन 13.5 किलो से पहले लगना जरूरी है। उम्र का एक क्राइटेरिया पहले ही निकल चुका है, अब सिर्फ वजन का ही सहारा है। इसलिए पिछले तीन महीने से बच्ची को सख्त डाइट पर रखा गया है।

3 साल की अनिका शर्मा के इलाज के लिए क्राउड फंडिंग अभियान – 9 करोड़ के इंजेक्शन की जरूरत

मां के अनुसार, अनिका को रोटी, चावल या वजन बढ़ाने वाली चीजें नहीं दी जातीं। उसे पपीता, चुनिंदा फ्रूट्स का जूस, चाय-बिस्किट और खास तरह का पाउडर मिलाकर हलवा दिया जाता है। मखाना सेंककर, उसमें बादाम, अखरोट और खांड मिलाकर बनाया गया पाउडर दूध में मिलाकर खिलाया जाता है, ताकि पेट भी भरे और वजन भी कंट्रोल में रहे।

मां बताती हैं कि रोज एक जैसा खाना खाकर बच्ची भी परेशान हो चुकी है। कई बार वह सुबह से शाम तक भूखी रहती है, क्योंकि उसे वही चीज नहीं खानी होती। बाहर कोई कुछ खिला दे तो वह वही मांगती है, लेकिन वजन बढ़ने के डर से माता-पिता को वह चीज छीननी पड़ती है। यह उनके लिए भी बेहद भावनात्मक पल होता है।

अनिका को सांस लेने में भी दिक्कत होती है। बाहर के माहौल में रहने से उसे सर्दी हो जाती है, जिससे परेशानी बढ़ जाती है। घर में मशीन रखी गई है और बार-बार उसका वजन चेक किया जाता है।

इलाज के लिए 9 करोड़ रुपए का इंजेक्शन अमेरिका से आना है। अब तक क्राउड फंडिंग और डोनेशन से 5 करोड़ 60 लाख रुपए जुटाए जा चुके हैं। 3 करोड़ 40 लाख रुपए अब भी बाकी हैं। पिता प्रवीण शर्मा नवंबर से लगातार अभियान चला रहे हैं। दिल्ली एम्स से 50 लाख रुपए स्वीकृत हुए हैं। इंदौर, रतलाम, बदनावर, बड़नगर में कैंप लगाकर फंड जुटाया गया है। खंडवा और उज्जैन में भी तैयारी है। कई सेलिब्रिटी भी वीडियो बनाकर अपील कर चुके हैं।

डॉक्टर्स के मुताबिक SMA एक दुर्लभ न्यूरो-मस्क्यूलर जेनेटिक बीमारी है। इसमें दिमाग और स्पाइनल कॉर्ड से मांसपेशियों तक जाने वाले सिग्नल कम हो जाते हैं। बच्चा धीरे-धीरे शरीर पर कंट्रोल खोने लगता है। बैठना, चलना, सांस लेना और निगलना तक मुश्किल हो सकता है।

इस बीमारी की दवा फिलहाल सिर्फ एक कंपनी नोवार्टिस बना रही है। रिसर्च और ट्रायल का खर्च बहुत ज्यादा है और मरीज भी गिने-चुने होते हैं, इसलिए दवा बेहद महंगी है। इलाज जीन थैरेपी से किया जाता है, जिसमें कोशिकाओं में नया या बदला हुआ जीन डाला जाता है।

डॉ. जैन के अनुसार, गर्भ में ही इस बीमारी की पहचान संभव है। सही समय पर इलाज मिले तो बच्चा स्वस्थ हो सकता है, लेकिन देर होने पर नष्ट हो चुकी कोशिकाएं वापस ठीक नहीं हो पातीं।

आज अनिका की जिंदगी जनता के सहयोग पर टिकी है। परिवार की अपील है कि अब तक 5.60 करोड़ तक पहुंच चुके हैं, बस 3.40 करोड़ की और जरूरत है। अगर समाज साथ दे दे, तो इस मासूम को जीवनदान मिल सकता है।

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