धमतरी और गरियाबंद जिले की सीमा पर स्थित निरई माता मंदिर अपनी अनोखी परंपराओं के कारण अलग पहचान रखता है। यहां की सबसे बड़ी विशेषता है ‘स्वयंभू’ ज्योति, जिसे लेकर श्रद्धालुओं का मानना है कि यह बिना तेल या घी के, दैवीय शक्ति से खुद ही प्रज्वलित होती है।
मंदिर के कपाट पूरे साल बंद रहते हैं। केवल चैत्र नवरात्रि के पहले रविवार को इसे खोला जाता है और वह भी महज 5 घंटे के लिए। इसी दौरान हजारों पुरुष श्रद्धालु माता के दर्शन कर अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं।
इस मंदिर की सबसे चौंकाने वाली परंपरा है महिलाओं का प्रवेश वर्जित होना। मान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में एक बैगा पुजारी की सेवा से प्रसन्न होकर माता स्वयं उनकी देखभाल करती थीं। लेकिन एक घटना के बाद जिसमे बैगा की पत्नी को संदेह हो गया जिससे देवी नाराज हो गईं फलस्वरूप उन्होंने आदेश दिया कि भविष्य में कोई भी महिला उनके दर्शन नहीं कर सकेगी।
तभी से आज तक इस मंदिर में महिलाओं का प्रवेश और प्रसाद ग्रहण करना पूरी तरह से प्रतिबंधित माना जाता है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि इस नियम को तोड़ने पर अनिष्ट की आशंका बनी रहती है।
यहां पूजा के नियम भी बेहद सख्त हैं। पुरुष श्रद्धालुओं को मंदिर में प्रवेश से पहले बेल्ट, लाल कपड़े और तिलक हटाना होता है। माता को सिंदूर, कुमकुम या सुहाग से जुड़ी कोई वस्तु नहीं चढ़ाई जाती। केवल नारियल और अगरबत्ती से ही पूजा की जाती है।
हालांकि मंदिर तक पहुंचने का रास्ता कठिन है, लेकिन चैत्र नवरात्रि के पहले रविवार को यहां मेला जैसा माहौल बन जाता है। दूर-दूर से आए श्रद्धालु घंटों लाइन में खड़े होकर माता की एक झलक पाने का इंतजार करते हैं।
लोगों की आस्था है कि जो भी भक्त सच्चे मन से यहां नारियल चढ़ाता है, उसकी झोली माता कभी खाली नहीं छोड़ती।
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