भिलाई की पत्रिका न्यूज़ : कभी गुस्से में आपका चेहरा लाल हुआ है? या खुशी में रोंगटे खड़े हो गए हों? या फिर डर के मारे हथेलियों में पसीना आ गया हो?
अगर हां, तो आपने ‘एमिग्डला हाइजैक’ का अनुभव किया है — यह हमारे दिमाग की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जो भावनाओं के नियंत्रण से जुड़ी होती है।
हमारे दिमाग के बीचों-बीच स्थित एमिग्डला भावनाओं को कंट्रोल करता है। जब कोई भावनात्मक स्थिति बहुत तेज हो जाती है — चाहे गुस्सा हो, डर हो या बहुत ज्यादा खुशी — तब एमिग्डला तेजी से एक्टिव हो जाता है और दिमाग का सोचने वाला हिस्सा फ्रंटल लोब डिसेबल हो जाता है। इसी को एमिग्डला हाइजैक कहा जाता है।
एमिग्डला क्या है?
दिमाग के अंदर दो छोटे बादाम जैसे हिस्से — जिन्हें एमिग्डला कहते हैं — हमारे डर, गुस्से और खुशी जैसी भावनाओं को संचालित करते हैं। यही वह जगह है जो किसी खतरे का एहसास होने पर सबसे पहले सक्रिय होती है।
एमिग्डला हाइजैक क्या होता है?
जब कोई स्थिति भावनात्मक रूप से बहुत भारी हो जाती है तो एमिग्डला हमारी मर्जी के बिना ही नियंत्रण अपने हाथ में ले लेता है। इससे सोचने-समझने की क्षमता क्षण भर के लिए बंद हो जाती है और प्रतिक्रिया सिर्फ भावनाओं के आधार पर होती है।
एमिग्डला हाइजैक के लक्षण:
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चेहरा लाल होना
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तेज धड़कन और सांसें
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पसीना आना
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तुरंत और तेज प्रतिक्रिया देना
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बाद में पछतावा या शर्मिंदगी महसूस होना
चेहरा लाल होना
तेज धड़कन और सांसें
पसीना आना
तुरंत और तेज प्रतिक्रिया देना
बाद में पछतावा या शर्मिंदगी महसूस होना
एमिग्डला हाइजैक को कैसे रोकें या कंट्रोल करें?
1. माइंडफुलनेस:
अपनी भावनाओं को पहचानिए। जब लगे कि गुस्सा या डर बढ़ रहा है, तो रुकिए और गहरी सांस लें। शरीर में क्या बदलाव हो रहे हैं, उस पर ध्यान दीजिए।
2. धीमी और गहरी सांसें:
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4 सेकंड में सांस लें
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4 सेकंड रोकें
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6 सेकंड में धीरे-धीरे छोड़ें
इससे दिमाग को मैसेज मिलता है कि खतरा टल गया है और फ्रंटल कॉर्टेक्स दोबारा एक्टिव हो जाता है।
3. ट्रिगर को पहचानें:
समझिए कौन सी चीज़ें आपको ट्रिगर करती हैं — अपमान, असफलता या अनिश्चितता। पहचान होने से आप अगली बार बेहतर तैयारी के साथ प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
4. रीजनिंग की प्रैक्टिस करें:
घटना के बाद शांत होकर सोचिए — क्या डर वाजिब था? क्या मेरी प्रतिक्रिया सही थी? इससे आपका तार्किक हिस्सा मजबूत होता है।
कुछ आम सवाल और जवाब:
सवाल: क्या एमिग्डला हाइजैक सिर्फ गुस्से में होता है?
जवाब: नहीं, यह डर, शर्म, अपमान, असुरक्षा, घबराहट या तनाव में भी होता है।
सवाल: क्या यह कोई बीमारी है?
जवाब: नहीं, यह कोई मानसिक रोग नहीं, बल्कि दिमाग की एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।
सवाल: क्या योग और मेडिटेशन से इसे कंट्रोल किया जा सकता है?
जवाब: हां, योग और माइंडफुलनेस से एमिग्डला की संवेदनशीलता घटती है और फ्रंटल कॉर्टेक्स मजबूत होता है।
सवाल: बच्चों में भी होता है क्या?
जवाब: हां, बच्चों में फ्रंटल लोब पूरी तरह विकसित नहीं होता, इसलिए वे गुस्से या डर में रोते, चीखते या जिद करते हैं।
सवाल: क्या याददाश्त पर असर पड़ता है?
जवाब: हां, इस दौरान हिप्पोकैंपस कम एक्टिव होता है, इसलिए कई बातें याद नहीं रहतीं।
सवाल: फैसले भरोसेमंद होते हैं क्या?
जवाब: नहीं, ऐसे समय में लिए गए फैसले अक्सर जल्दबाजी और भावनाओं पर आधारित होते हैं।
सवाल: क्या सोशल मीडिया इसे बढ़ा सकता है?
जवाब: हां, निगेटिव खबरें और लगातार स्क्रीन टाइम से दिमाग हाइपर मोड में रहता है।
सवाल: क्या दवाएं ली जाती हैं?
जवाब: हां, जरूरत पड़ने पर डॉक्टर दवाएं या थेरेपी (CBT, माइंडफुलनेस) की सलाह दे सकते हैं।
भावनाओं पर नियंत्रण कोई जादू नहीं, बल्कि एक सीखने की प्रक्रिया है। अगर आप भी गुस्से, डर या तनाव में खुद को बेकाबू महसूस करते हैं, तो समय रहते मदद लेना बिल्कुल ज़रूरी है। थोड़ा सा अभ्यास और समझदारी, आपको एमिग्डला हाइजैक से बाहर निकलने में मदद कर सकती है।
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