भिलाई की पत्रिका न्यूज़ : अब एक्सपायर्ड या रिजेक्टेड फूड को नदियों, झीलों या खुले इलाकों में फेंकना पूरी तरह बैन हो गया है। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने इस पर सख्त आदेश जारी किए हैं। 4 नवंबर को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के फूड सेफ्टी कमिश्नर्स को लिखित निर्देश भेजे गए हैं कि ऐसे फूड आइटम्स का डिस्पोजल अब निगरानी में ही किया जाएगा।
डिस्पोजल पर फूड सेफ्टी ऑफिसर की निगरानी जरूरी
FSSAI के आदेश के मुताबिक, जब्त, रिजेक्टेड या एक्सपायर्ड फूड को नष्ट करने के दौरान फूड सेफ्टी ऑफिसर (FSO) या अधिकृत अधिकारी की मौजूदगी अनिवार्य होगी। पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग करनी होगी। डिस्पोजल के बाद प्रमाणपत्र बनाकर डेजिग्नेटेड ऑफिसर, फूड सेफ्टी कमिश्नर और फूड बिजनेस ऑपरेटर (FBO) को भेजना अनिवार्य होगा।
खुले में फेंकने से बढ़ रहा था खतरा
हाल के समय में कई रिपोर्ट्स सामने आईं कि जब्त फूड आइटम्स को नदियों या खुले मैदानों में फेंक दिया जाता है, जिससे वाटर पॉल्यूशन और स्वास्थ्य संबंधी खतरे बढ़ रहे थे। FSSAI ने साफ किया है कि ऐसा करना न केवल पर्यावरण के लिए हानिकारक है, बल्कि ऐसे उत्पादों के दोबारा सप्लाई चेन में जाने की संभावना भी बढ़ जाती है।
पहले भी जारी हुई थी गाइडलाइन, अब सख्ती से लागू होगी
इससे पहले दिसंबर 2020 में भी ऐसी गाइडलाइन जारी की गई थी, जिसे अब पूरी सख्ती के साथ लागू करने का आदेश दिया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अब किसी फूड आइटम को नष्ट करने की अनुमति केवल कोर्ट या अधिकृत अधिकारी के आदेश पर ही मिलेगी।
डिस्पोजल के नए नियम
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CPCB अप्रूव्ड इंसिनरेटर में जलाना जरूरी, जहां तापमान 800-1000°C तक होता है और पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड की जाती है।
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बायोडिग्रेडेबल वेस्ट के लिए कंपोस्टिंग या डेजिग्नेटेड सैनिटरी लैंडफिल्स में डिस्पोजल किया जाएगा, जहां लीचेट कंट्रोल सिस्टम मौजूद हो।
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अगर वेस्ट की मात्रा अधिक है, तो स्थानीय नगर पालिका या राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से समन्वय जरूरी होगा।
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राज्य सरकारें अपने क्षेत्रों में डिस्पोजल फैसिलिटी की लिस्ट बनाकर कमिश्नर को सौंपेंगी।
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हर महीने की 5 तारीख तक कंप्लायंस रिपोर्ट FSSAI को भेजनी होगी और किसी भी गड़बड़ी की तुरंत जानकारी देनी होगी।
CPCB अप्रूव्ड इंसिनरेटर में जलाना जरूरी, जहां तापमान 800-1000°C तक होता है और पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड की जाती है।
बायोडिग्रेडेबल वेस्ट के लिए कंपोस्टिंग या डेजिग्नेटेड सैनिटरी लैंडफिल्स में डिस्पोजल किया जाएगा, जहां लीचेट कंट्रोल सिस्टम मौजूद हो।
अगर वेस्ट की मात्रा अधिक है, तो स्थानीय नगर पालिका या राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से समन्वय जरूरी होगा।
राज्य सरकारें अपने क्षेत्रों में डिस्पोजल फैसिलिटी की लिस्ट बनाकर कमिश्नर को सौंपेंगी।
हर महीने की 5 तारीख तक कंप्लायंस रिपोर्ट FSSAI को भेजनी होगी और किसी भी गड़बड़ी की तुरंत जानकारी देनी होगी।
फूड सेफ्टी से जुड़े आम सवाल और जवाब
1) फूड सेफ्टी क्या है?
ऐसा खाना जो हमारी सेहत को नुकसान न पहुंचाए। इसमें साफ-सफाई, मिलावट रहित उत्पाद और सही पैकिंग का ध्यान रखा जाता है।
2) भारत में खाने को लेकर क्या अधिकार हैं?
हर नागरिक को सुरक्षित और शुद्ध भोजन का अधिकार है। इसके लिए फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट 2006 लागू है। इस एक्ट के तहत कोई भी कंपनी ऐसा खाना नहीं बेच सकती जो स्वास्थ्य को हानि पहुंचाए।
3) खराब या मिलावटी खाना मिले तो क्या करें?
ऐसी स्थिति में ग्राहक FSSAI या नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कर सकता है। दोषी पाए जाने पर दुकानदार या निर्माता पर जुर्माना या लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई हो सकती है।
4)‘100% शुद्ध’ या ‘100% सेफ’ वाले दावे क्या सही हैं?
FSSAI के नियमों के अनुसार, ऐसे दावे तभी मान्य हैं जब कंपनी के पास ठोस वैज्ञानिक प्रमाण या लैब टेस्ट रिपोर्ट हो। झूठे दावे करने पर कार्रवाई हो सकती है।
5) क्या बिना एक्सपायरी डेट वाला पैकेट शिकायत योग्य है?
हां, अगर पैक पर एक्सपायरी डेट नहीं लिखी है या छिपाई गई है, तो यह लेबलिंग नॉर्म्स का उल्लंघन है। इसकी शिकायत FSSAI या उपभोक्ता फोरम में की जा सकती है।
6) क्या ऑनलाइन फूड डिलीवरी एप्स भी FSSAI के दायरे में हैं?
हां, हर रेस्टोरेंट और क्लाउड किचन के पास FSSAI लाइसेंस होना जरूरी है। एप्स पर दिखने वाला FSSAI नंबर इसका प्रमाण होता है कि खाना सेफ्टी चेक से होकर आता है।
रिजेक्टेड और एक्सपायर्ड फूड के 3 सेफ डिस्पोजल तरीके
इंसीनेरेशन (जलाना)
फूड आइटम्स को 800–1000°C तापमान पर जलाया जाता है। गैस फिल्टर होकर निकलती है और राख बचती है।
फायदा: 90% कचरा पूरी तरह नष्ट।
कंपोस्टिंग (खाद बनाना)
फूड वेस्ट को मिक्स कर 3–6 महीने तक माइक्रोब्स और ऑक्सीजन के संपर्क में रखा जाता है।
फायदा: मिट्टी के लिए सस्ता और बेहतर खाद।
लैंडफिल (गड्ढे में डालना)
कचरे और मिट्टी की परत बनाकर डंप किया जाता है, जिससे गैस और तरल बनता है।
फायदा: आसान, कम लागत और गैस से ऊर्जा उत्पादन।
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