भिलाई की पत्रिका न्यूज़ : एसी स्लीपर बसों में सफर अब खतरनाक होता जा रहा है। आए दिन ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं जहां स्लीपर बस में आग लग जाती है, बस पलट जाती है या किसी वाहन से टकरा जाती है। इन हादसों में कई परिवारों की ज़िंदगियां उजड़ चुकी हैं।
सिर्फ जनवरी से अब तक उत्तर प्रदेश में 1257 बस हादसे हो चुके हैं, जिनमें 400 से अधिक लोगों की मौत हुई है। इनमें सबसे ज्यादा घटनाएं स्लीपर बसों से जुड़ी रही हैं। सवाल उठ रहा है कि आखिर एसी स्लीपर बसें कितनी सुरक्षित हैं?
ट्रेन का विकल्प बनीं स्लीपर बसें
लखनऊ संभाग के आरटीओ (प्रवर्तन) प्रभात पांडेय के अनुसार, रेलवे में रिजर्वेशन न मिलने से लोग लंबी दूरी की यात्रा के लिए स्लीपर बसों का विकल्प चुन रहे हैं। बिहार से दिल्ली, लखनऊ से सूरत, बेंगलुरु या जयपुर जैसे रूट्स पर ये बसें ऑल इंडिया टूरिस्ट परमिट से चलाई जा रही हैं।
हादसों का सबसे बड़ा कारण — ड्राइवर की गलती
लॉन्ग रूट पर बस चलाने वाले ड्राइवर घंटों गाड़ी चलाते हैं, जिससे नींद या थकावट के कारण हादसे हो जाते हैं। पांडेय का कहना है कि अगर दो ड्राइवरों को तैनात किया जाए और वे बारी-बारी से गाड़ी चलाएं, तो हादसों में काफी कमी आ सकती है।
एसी स्लीपर बसों में आग क्यों लगती है?
आरटीओ के मुताबिक, स्लीपर बसें अब हाईटेक हो गई हैं। इनके हाइड्रॉलिक डोर, बंद शीशे और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम किसी भी छोटे फॉल्ट या टायर घर्षण से तेजी से आग फैलने का कारण बनते हैं। कुशन और गद्दों का कपड़ा भी जल्दी आग पकड़ लेता है।
आग लगने पर डोर हो जाते हैं लॉक
जब बस में आग लगती है, तो वायरिंग जल जाने से डोर ऑटो लॉक हो जाते हैं। यात्रियों के पास बाहर निकलने का रास्ता नहीं बचता। इसलिए हर शीशे पर हैमर (हथौड़ा) होना बेहद जरूरी है ताकि आपात स्थिति में शीशा तोड़कर बाहर निकला जा सके।
ऑपरेटर बढ़ा रहे खतरा
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कई बस संचालक इमरजेंसी गेट को ब्लॉक कर देते हैं और वहां सीट लगा देते हैं। इससे आग या हादसे की स्थिति में यात्रियों का निकलना असंभव हो जाता है। तकनीकी जांच में पाया गया है कि कई बसों में बॉडी बढ़ाकर डिजाइन बदली गई है, जो सुरक्षा मानकों के खिलाफ है।
कई बस संचालक इमरजेंसी गेट को ब्लॉक कर देते हैं और वहां सीट लगा देते हैं। इससे आग या हादसे की स्थिति में यात्रियों का निकलना असंभव हो जाता है। तकनीकी जांच में पाया गया है कि कई बसों में बॉडी बढ़ाकर डिजाइन बदली गई है, जो सुरक्षा मानकों के खिलाफ है।
फायर सेफ्टी का भी अभाव
कई बसों में रखे फायर एक्सटिंग्विशर एक्सपायर हो चुके हैं या रिफिल नहीं कराए गए। पांडेय ने बताया कि हर बस में बड़े सिलेंडर और कम से कम दो इमरजेंसी गेट होना अनिवार्य किया जाना चाहिए।
कई बसों में रखे फायर एक्सटिंग्विशर एक्सपायर हो चुके हैं या रिफिल नहीं कराए गए। पांडेय ने बताया कि हर बस में बड़े सिलेंडर और कम से कम दो इमरजेंसी गेट होना अनिवार्य किया जाना चाहिए।
स्लीपर बसों का डिजाइन भी बनता है मौत का कारण
2x1 डिज़ाइन में बनी बसों में गलियारा बहुत तंग होता है — मात्र 2 से 3 फीट चौड़ा। हादसे के वक्त एक साथ कई यात्रियों का बाहर निकलना नामुमकिन हो जाता है, खासकर ऊपर की बर्थ पर सोए लोगों के लिए।
2x1 डिज़ाइन में बनी बसों में गलियारा बहुत तंग होता है — मात्र 2 से 3 फीट चौड़ा। हादसे के वक्त एक साथ कई यात्रियों का बाहर निकलना नामुमकिन हो जाता है, खासकर ऊपर की बर्थ पर सोए लोगों के लिए।
ज्वलनशील सामग्री और ओवरलोड वायरिंग भी जिम्मेदार
स्लीपर बसों में कर्टन, बर्थ कवर, प्लास्टिक पैनल और कमजोर वायरिंग आग फैलने का बड़ा कारण बनते हैं। एसी मोटर या शॉर्ट सर्किट से आग पूरे केबिन में फैल जाती है।
स्लीपर बसों में कर्टन, बर्थ कवर, प्लास्टिक पैनल और कमजोर वायरिंग आग फैलने का बड़ा कारण बनते हैं। एसी मोटर या शॉर्ट सर्किट से आग पूरे केबिन में फैल जाती है।
रात की यात्रा सबसे ज्यादा जोखिमभरी
अधिकांश स्लीपर बसें रात में 300 से 1000 किलोमीटर तक चलती हैं। देर रात और सुबह 6 बजे के बीच ड्राइवर के सो जाने की संभावना सबसे अधिक होती है। कई हादसे इसी वजह से हुए हैं।
कहां से शुरू हुई स्लीपर बसें?
स्लीपर बसों की शुरुआत 1930 में अमेरिका से हुई थी। धीरे-धीरे ये कई देशों में चलीं, लेकिन लगातार हादसों के चलते इंग्लैंड, जर्मनी और चीन जैसे देशों में इन पर बैन लगा दिया गया।
ये 5 तरीके सफर को बनाएंगे सुरक्षित
बसों के मॉडिफिकेशन के समय पुरानी बसों को नए सर्टिफिकेट के साथ चलने पर पाबंदी हो।
एसी बसों के मॉडिफिकेशन में अच्छी क्वालिटी की वायरिंग, गैस टैंक और मोटर का इस्तेमाल हो।
स्लीपर बसों में सीटें कम करके गलियारे को चौड़ा किया जाए।
इमरजेंसी एग्जिट और सेफ्टी टूल्स की व्यवस्था की जाए।
लंबे रूट पर बसों में दो ड्राइवर रखने का नियम बनाया जाए।
यूपी के कुछ बड़े स्लीपर बस हादसे
15 मई 2025: लखनऊ-रायबरेली मार्ग पर आग लगने से 5 की मौत।
11 मार्च 2024: गाजीपुर में बिजली लाइन से टकराने पर 5 की मौत।
8 नवंबर 2023: हमीरपुर जाते वक्त बस में आग, 2 की मौत।
14 फरवरी 2022: मथुरा में रोडवेज बस में आग, 1 की मौत।
10 जनवरी 2020: कन्नौज में 20 यात्रियों की मौत।
25 मार्च 2019: आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे पर आग, 4 की मौत।
9 दिसंबर 2008: फिरोजाबाद में भीषण हादसे में 63 लोगों की मौत
15 मई 2025: लखनऊ-रायबरेली मार्ग पर आग लगने से 5 की मौत।
11 मार्च 2024: गाजीपुर में बिजली लाइन से टकराने पर 5 की मौत।
8 नवंबर 2023: हमीरपुर जाते वक्त बस में आग, 2 की मौत।
14 फरवरी 2022: मथुरा में रोडवेज बस में आग, 1 की मौत।
10 जनवरी 2020: कन्नौज में 20 यात्रियों की मौत।
25 मार्च 2019: आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे पर आग, 4 की मौत।
9 दिसंबर 2008: फिरोजाबाद में भीषण हादसे में 63 लोगों की मौत
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