भिलाई की पत्रिका न्यूज़ : छत्तीसगढ़ में शिक्षा को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। स्कूल शिक्षा विभाग के हालिया फैसले ने अभिभावकों और शिक्षा विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। शैक्षणिक सत्र 2026-27 से निजी स्कूलों में RTE के तहत कमजोर वर्ग के बच्चों को अब केवल कक्षा पहली से ही प्रवेश मिलेगा।
रायपुर में 16 दिसंबर 2025 को लिए गए इस निर्णय के बाद शिक्षा जगत में हलचल मच गई है। अब तक निजी स्कूलों में नर्सरी, प्री-प्राइमरी PP-1, PP-2 और कक्षा 1 में RTE के तहत दाखिले का प्रावधान था, लेकिन नए आदेश में इसे सीमित कर दिया गया है।
इस फैसले का कड़ा विरोध करते हुए छत्तीसगढ़ पैरेंट्स एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष किष्टोफर पॉल ने इसे RTE कानून की धारा 12(1)(ग) का सीधा उल्लंघन बताया। उन्होंने कहा कि कानून में स्पष्ट है कि यदि कोई स्कूल पूर्व-प्राथमिक शिक्षा देता है, तो वहां भी 25 प्रतिशत आरक्षण लागू होगा।
किष्टोफर पॉल ने कर्नाटक हाईकोर्ट के 17 अप्रैल 2017 के फैसले (W.P. No. 14241/2017) का हवाला देते हुए कहा कि RTE में प्रवेश के दो स्तर तय हैं—एक कक्षा 1 और दूसरा पूर्व-प्राथमिक स्तर। ऐसे में सरकार का यह निर्णय कानून की मंशा के खिलाफ है।
उन्होंने राज्य सरकार से मांग की है कि इस फैसले को तुरंत निरस्त किया जाए और RTE के तहत गरीब बच्चों को निजी स्कूलों में पूर्व-प्राथमिक स्तर से ही प्रवेश का अधिकार फिर से दिया जाए।शिक्षाविदों और विशेषज्ञों का कहना है कि इस बदलाव से सबसे बड़ा नुकसान प्रारंभिक शिक्षा पर पड़ेगा। 3 से 6 वर्ष की उम्र में मिलने वाली पूर्व-प्राथमिक शिक्षा बच्चे के बुनियादी विकास के लिए बेहद जरूरी होती है। इस अवसर से वंचित होने पर गरीब बच्चों में आगे चलकर सीखने का अंतर बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि बच्चा सीधे कक्षा 1 में निजी स्कूल में प्रवेश करता है, तो वह पहले से पढ़ रहे संपन्न वर्ग के बच्चों से पीछे रह सकता है। इससे शैक्षणिक और सामाजिक असमानता और गहरी होगी। छत्तीसगढ़ प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने भी इस फैसले को “RTE विरोधी” बताया है।
आलोचकों का यह भी कहना है कि सरकार पूर्व-प्राथमिक स्तर पर फीस रीइंबर्समेंट के वित्तीय बोझ से बचना चाहती है, लेकिन इसका सीधा असर गरीब बच्चों पर पड़ेगा। शुरुआती स्तर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा न मिलने से बच्चों के ड्रॉपआउट होने का खतरा भी बढ़ सकता है।
शिक्षाविद और RTE विशेषज्ञ इस निर्णय को कानून की भावना के विपरीत मानते हैं। उनका कहना है कि RTE एक्ट में पूर्व-प्राथमिक शिक्षा को बाहर रखने की कोई गुंजाइश नहीं है। राष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञों के मुताबिक, निजी स्कूलों में शुरुआती प्रवेश से समावेशी शिक्षा को बढ़ावा मिलता है।
वहीं शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह फैसला प्रवेश प्रक्रिया को सरल बनाने और गड़बड़ियों पर रोक लगाने के लिए लिया गया है। हालांकि पैरेंट्स एसोसिएशन और विशेषज्ञ इसे गरीब विरोधी कदम मान रहे हैं। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार इस विरोध पर क्या रुख अपनाती है या मामला अदालत तक पहुंचता है।
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