नए प्रावधानों के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति अवैध तरीके से धर्मांतरण कराता हुआ दोषी पाया जाता है, तो उसे 7 से 10 साल तक की जेल और कम से कम 5 लाख रुपए जुर्माना देना होगा।
वहीं, अगर पीड़ित नाबालिग, महिला, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग से है, तो सजा और कड़ी हो जाएगी। ऐसे मामलों में 10 से 20 साल तक की जेल और न्यूनतम 10 लाख रुपए जुर्माना तय किया गया है।
सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में कानून और भी सख्त है। इसमें 10 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान किया गया है, साथ ही कम से कम 25 लाख रुपए का जुर्माना भी लगेगा।
यह नया विधेयक गृहमंत्री विजय शर्मा द्वारा सदन में पेश किया गया, जो अब 1968 के पुराने कानून की जगह लेगा। सरकार का कहना है कि पुराना कानून आज के समय और तकनीक के हिसाब से कमजोर हो चुका था, इसलिए इसे और मजबूत किया गया है।
सरकार के अनुसार इस कानून का उद्देश्य बल, प्रलोभन, धोखाधड़ी या गलत जानकारी देकर कराए जाने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाना है। बिल पास होते ही सदन में बीजेपी विधायकों ने जय श्री राम के नारे लगाए।
दूसरी ओर, विपक्ष ने इस बिल का विरोध किया और वॉकआउट कर दिया। नेता प्रतिपक्ष चरण दास महंत ने कहा कि इस तरह के कानून पर जल्दबाजी में फैसला नहीं होना चाहिए और इसे सेलेक्ट कमेटी को भेजा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के रिटायर्ड जजों सहित सभी पक्षों की राय लेना जरूरी है।
विपक्ष ने यह भी चिंता जताई कि ऐसा कोई फैसला नहीं होना चाहिए, जिससे समाज में विभाजन बढ़े। उन्होंने संविधान और सहिष्णुता का हवाला देते हुए अपने तर्क रखे।
वहीं बीजेपी विधायक अजय चंद्राकर ने इन आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि ऐसे कानून पहले भी कई राज्यों में लागू हैं, यहां तक कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार के समय भी ऐसा कानून रहा है।
उपमुख्यमंत्री और गृहमंत्री विजय शर्मा ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया है, जिससे राज्य इस तरह का कानून नहीं बना सकते। उन्होंने कहा कि संविधान के तहत राज्य सरकार को कानून बनाने का पूरा अधिकार है और यह बिल पूरी तैयारी के साथ लाया गया है।
सदन की कार्यवाही चला रहे धर्मलाल कौशिक ने कांग्रेस की आपत्तियों को खारिज करते हुए बिल पेश करने की अनुमति दे दी। इसके बाद कांग्रेस विधायकों ने पूरे दिन की कार्यवाही का बहिष्कार किया, जिस पर विजय शर्मा ने इसे वॉकआउट नहीं बल्कि “भागना” बताया।
यह बिल पिछले हफ्ते ही राज्य कैबिनेट से मंजूर हुआ था। सरकार का कहना है कि इसमें 1968 के कानून को और मजबूत किया गया है और धर्मांतरण के नए तरीकों, जैसे डिजिटल और आर्थिक प्रलोभन, को भी इसमें शामिल किया गया है।
फिलहाल प्रदेश में ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 1968’ लागू था, जिसे राज्य गठन के बाद अपनाया गया था, लेकिन अब नए कानून के साथ सख्ती और बढ़ गई है।
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