दरअसल, Strait of Hormuz से होकर दुनिया भर में कच्चे तेल और गैस की सप्लाई होती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के सख्त रुख के बाद कई टैंकर इस रास्ते से गुजरने से बच रहे हैं। खाड़ी के खुले समुद्री इलाके में जहाजों का रुकना वैश्विक सप्लाई चेन के लिए बड़ा संकेत है।
एशिया की चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि इस संकट के केंद्र में कतर है। Qatar दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गैस निर्यातक देश है और उसका ज्यादातर निर्यात इसी होर्मुज रास्ते से होता है। भारत अपनी कुल गैस जरूरत का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा कतर से खरीदता है। ऐसे में भारत के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील बन गई है।
पिछले साल कतर ने 82.2 मिलियन टन गैस का निर्यात किया था। इसमें 20 मिलियन टन के साथ चीन सबसे बड़ा खरीदार रहा, जबकि 12 मिलियन टन के साथ भारत दूसरे स्थान पर रहा। ताइवान, पाकिस्तान और दक्षिण कोरिया भी कतर की गैस पर काफी हद तक निर्भर हैं।
ऊर्जा विशेषज्ञों को मौजूदा हालात में चार साल पहले का रूस-यूक्रेन युद्ध याद आ रहा है, जब गैस सप्लाई में भारी उथल-पुथल मची थी। रूस दुनिया का बड़ा गैस सप्लायर है और उस समय यूरोप को तेज महंगाई का सामना करना पड़ा था। इस बार संकट का केंद्र एशिया माना जा रहा है।
शिप ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, कम से कम 11 एलएनजी टैंकरों ने फिलहाल अपनी यात्रा रोक दी है। कतर के अलावा United Arab Emirates भी इसी समुद्री रास्ते से गैस निर्यात करता है। हालांकि कतर की सरकारी कंपनी QatarEnergy ने आधिकारिक तौर पर शिपमेंट रोकने की घोषणा नहीं की है, लेकिन बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है।
चूंकि एलएनजी के अंतरराष्ट्रीय कॉन्ट्रैक्ट कच्चे तेल के दाम से जुड़े होते हैं, इसलिए ब्रेंट क्रूड में उछाल का सीधा असर गैस कीमतों पर पड़ सकता है। अगर स्थिति लंबी खिंची, तो भारत, जापान और अन्य एशियाई देशों में गैस के दाम बढ़ना लगभग तय है।
इस तनाव का असर तुर्की पर भी पड़ सकता है, जो अपनी करीब 15 फीसदी गैस सप्लाई ईरान से पाइपलाइन के जरिए लेता है। यदि हालात सामान्य नहीं हुए, तो कई देशों में ऊर्जा संकट गहराने की आशंका है।
फिलहाल पूरी दुनिया की नजर होर्मुज जलडमरूमध्य पर टिकी है। अगर यहां हालात बिगड़े, तो उसकी सीधी चोट आम जनता की रसोई और जेब पर पड़ेगी।
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