दरअसल, कन्या पूजन में कन्याओं के साथ एक छोटे बालक को बैठाना भी जरूरी माना जाता है। इस बालक को आम भाषा में ‘लंगूर’ कहा जाता है, लेकिन इसका धार्मिक महत्व काफी गहरा है।
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शास्त्रों के अनुसार, इस बालक को ‘बटुक भैरव’ का स्वरूप माना जाता है। मान्यता है कि शक्ति की उपासना तब तक पूर्ण नहीं होती, जब तक उसके साथ रक्षक की उपस्थिति न हो।
जिस तरह भगवान शिव ने माता के शक्तिपीठों की रक्षा का दायित्व भैरव जी को सौंपा, उसी तरह कन्या पूजन में बालक की उपस्थिति सुरक्षा और मर्यादा का प्रतीक मानी जाती है।
कई स्थानों पर इस बालक को हनुमान जी का प्रतिनिधि भी माना जाता है, जो माता की सेवा और रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।
धार्मिक ग्रंथों, खासकर देवी भागवत पुराण और अग्नि पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि कुमारी पूजन के साथ ‘बटुक’ का पूजन अनिवार्य होता है। मान्यता है कि बिना भैरव स्वरूप बालक के भोग लगाए माता रानी पूजा को पूरी तरह स्वीकार नहीं करतीं।
नौ कन्याओं के साथ एक बालक को भोजन कराना पूजा की पूर्णता और शुभ फल प्राप्ति का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि इस परंपरा को आज भी पूरे श्रद्धा भाव से निभाया जाता है।
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