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मोबाइल की गिरफ्त में बचपन! जानिए कैसे पहचानें गेम्स की खतरनाक लत,माता-पिता तुरंत पहचानें ये चेतावनी संकेत!

भिलाई की पत्रिका न्यूज़ : क्या आपका बच्चा रोज एक घंटे से ज्यादा मोबाइल गेम खेलता है? क्या मोबाइल छीनने पर वह उग्र हो जाता है या गुमसुम रहने लगा है? अगर हां, तो अब सतर्क हो जाइए। एक्सपर्ट्स का कहना है कि AI बेस्ड मोबाइल गेम्स बच्चों को ऐसी लत में फंसा रहे हैं, जो उन्हें खतरनाक रास्ते तक ले जा सकती है।

हाल ही में गाजियाबाद की एक सोसाइटी की 9वीं मंजिल से कूदकर तीन सगी बहनों ने सुसा.इड कर लिया। 12, 14 और 16 साल की इन बहनों के बारे में सामने आया कि वे AI बेस्ड कोरियन मोबाइल गेम की एडिक्ट थीं। उन्होंने अपने नाम तक कोरियन रख लिए थे। इस घटना ने हर माता-पिता को सोचने पर मजबूर कर दिया है।


मोबाइल गेम एडिक्शन से बच्चों पर खतरा

मानसिक स्वास्थ्य संस्थान आगरा के निदेशक प्रो. डॉ. दिनेश राठौर बताते हैं कि मोबाइल बच्चों की आसान पहुंच में होता है, इसलिए इसकी लत जल्दी लगती है। कई बार पेरेंट्स की लापरवाही भी वजह बनती है। यह तय करना जरूरी है कि मोबाइल कब, कितना और कैसे इस्तेमाल होगा।

डॉ. राठौर के अनुसार, हाल की रिसर्च में सामने आया है कि सोशल मीडिया, वीडियो गेम्स और OTT प्लेटफॉर्म AI बेस्ड हैं। बच्चों का कोरा दिमाग इस सिस्टम को समझ नहीं पाता और वे आसानी से AI के ट्रैप में आ जाते हैं। सही देखभाल न होने पर यह एडिक्शन में बदल जाता है।

वे कहते हैं कि बच्चों की जरूरत पूरी करें, मांग नहीं। परिवार मिलकर तय करे कि बच्चे के लिए क्या जरूरी है। ऐसा न हो कि एक सदस्य मोबाइल पर रोक लगाए और दूसरा खुद मोबाइल पकड़ा दे। एकजुट होकर नियम बनाना जरूरी है।

अधिकांश ऑनलाइन गेम्स में रिवॉर्ड सिस्टम होता है। हर स्टेप पर मिलने वाले प्वाइंट से बच्चों के दिमाग में डोपामिन का स्राव बढ़ता है। एक घंटे से ज्यादा खेलने पर बच्चे को वही खुशी सिर्फ गेम से मिलने लगती है। पढ़ाई या खेलकूद से मिलने वाली खुशी फीकी पड़ जाती है।

डॉ. राठौर बताते हैं कि रोजाना OPD में 3 से 4 पेरेंट्स बच्चों को लेकर आते हैं। शिकायत होती है कि बच्चा चिड़चिड़ा, उदास या उग्र हो गया है। काउंसलिंग में सामने आता है कि बच्चा मोबाइल एडिक्ट है। यह भी एक तरह का नशा और मनोरोग है, लेकिन लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते। काउंसलिंग और दवाओं से सुधार संभव है।

एसएन मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभाग के HOD प्रो. डॉ. विशाल सिन्हा बताते हैं कि 20 साल तक के जो मरीज आ रहे हैं, उनमें बड़ी संख्या मोबाइल गेम की लत से जुड़ी है। यह लत शराब जैसी होती है। रोकने पर बच्चे हिं.सक भी हो सकते हैं। इलाज में 4-5 महीने तक का समय लग सकता है।

इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMI) की रिपोर्ट के अनुसार, देश में इंटरनेट यूजर्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में। इससे बच्चों की ऑनलाइन पहुंच भी बढ़ी है।

आगरा में पिछले साल दो सहेलियां पबजी के टास्क के चलते घर छोड़कर चली गई थीं। तीन दिन बाद पुलिस ने उन्हें खोजा। कई मामलों में ऑनलाइन गेम में पैसे हारने की शिकायतें भी पुलिस तक पहुंची हैं।

डीसीपी साइबर क्राइम आदित्य सिंह का कहना है कि पुलिस लगातार लोगों को जागरूक कर रही है। बच्चों को मोबाइल से दूर रखें और नजर रखें कि वे किसी ऑनलाइन गेम के जाल में तो नहीं फंस रहे।

एक बात साफ है—मोबाइल बच्चों के हाथ में देने से पहले बड़ों को अपनी आदत बदलनी होगी। बच्चों से बात करें, उनके दोस्त बनें, उनके साथ समय बिताएं।

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माता-पिता यह करें:

  • माता-पिता घर पर बच्चों को समय दें।

  • बच्चों को फिजिकल एक्टिविटी कराएं।

  • बच्चों को महापुरुषों की कहानी सुनाएं।

  • बच्चों को हो सके तो सप्ताह में एक दिन मोबाइल से दूर रखें।

 मोबाइल या गेम्स की लत यूं पहचानें:

  • मोबाइल पर कई घंटे तक गेम खेलना।

  • मोबाइल पर देर रात तक गेम खेलना।

  • नींद में कमी आना।

  • सिरदर्द और थकान की शिकायत।

  • बच्चे का बेवजह से उदास रहना।

  • मोबाइल छीनने पर उग्र व्यवहार करना।

  • बच्चों का अचानक से गुमसुम रहना।

  • पढ़ाई में कमजोर होना।

  • व्यवहार में चिड़चिड़ापन आना।

  • दोस्तों और परिवार से दूरी बनाना।

  • ऑनलाइन दोस्तों या गेम के कैरेक्टर्स की बात करना।

  • खाना खाने पर ध्यान नहीं देना।

  • फिजिकली कम एक्टिव रहना।

  • बात-बात पर झूठ बोलना या बातें छिपाना।

अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा सुरक्षित और खुशहाल रहे, तो आज से ही मोबाइल इस्तेमाल को लेकर घर में नियम बनाएं। ऐसी जरूरी खबरों और जागरूकता से जुड़ी जानकारी के लिए हमारे साथ जुड़े रहें।



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