दो साल पहले जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने नक्सलवाद खत्म करने की समयसीमा तय की थी, तब यह लक्ष्य कई लोगों को नामुमकिन लग रहा था। जमीन पर काम करने वाले लोग भी इसे लेकर आश्वस्त नहीं थे, लेकिन आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।
संसद में सोमवार को अमित शाह ने साफ कहा कि छत्तीसगढ़ अब नक्सलमुक्त होने की दिशा में निर्णायक कदम उठा चुका है। उन्होंने इस सफलता का श्रेय सीएपीएफ, कोबरा, राज्य पुलिस, डीआरजी के जवानों और स्थानीय आदिवासियों को दिया। साथ ही अभियान में जान गंवाने वाले जवानों को श्रद्धांजलि भी दी।
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले तीन सालों में 706 नक्सली मारे गए, जबकि 4800 से ज्यादा ने हथियार छोड़कर पुनर्वास योजना अपनाई। देश में अब सिर्फ दो जिले ही नक्सल प्रभावित बचे हैं।
छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार बनने के बाद केंद्र और राज्य ने मिलकर रणनीति बनाई। अगस्त 2024 में बस्तर से अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद खत्म करने का ऐलान किया था। इसके बाद लगातार बैठकें हुईं और जमीनी स्तर पर प्लान लागू किया गया।
इस पूरी रणनीति में विजय शर्मा की भी अहम भूमिका रही। उन्होंने नक्सल प्रभावित इलाकों में जाकर लोगों से संवाद किया और मुख्यधारा में लौटने का संदेश पहुंचाया।
नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई थी, जो धीरे-धीरे बस्तर तक फैल गई। इसने हजारों जिंदगियां प्रभावित कीं, लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं।
बीते दो सालों में करीब 3000 नक्सली मुख्यधारा में लौटे, 2000 गिरफ्तार हुए और 500 से ज्यादा नक्सली मा*रे गए। कुल मिलाकर 5000 से अधिक नक्सली कम हुए हैं।
हालांकि इस संघर्ष की कीमत भी बड़ी रही। 1987 से 2026 के बीच 1416 जवान शहीद हुए। 1277 आईडी ब्ला*स्ट में 443 जवानों की जान गई और 915 घायल हुए।
बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पट्टिलिंगम के मुताबिक, यह सफलता मजबूत रणनीति और बेहतर तालमेल का नतीजा है। डीआरजी, एसटीएफ, बस्तर फाइटर्स और केंद्रीय बलों ने मिलकर काम किया, जिससे नक्सलियों के लिए छुपना मुश्किल हो गया।
उन्होंने बताया कि पहले नक्सली एक राज्य से दूसरे राज्य में भाग जाते थे, लेकिन अब अंतरराज्यीय समन्वय इतना मजबूत है कि उनके पास कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं बचा है।
नक्सल संगठन पहले आतंक के दम पर चलता था। आम लोगों को डरा-धमका कर अपने साथ जोड़ता था, लेकिन अब हालात बदल गए हैं। जनता का भरोसा सुरक्षा बलों पर बढ़ा है और डर का माहौल खत्म हो रहा है।
बस्तर का भौगोलिक क्षेत्र भी चुनौती भरा रहा। घने जंगल, पहाड़ और दूर-दराज के इलाके ऑपरेशन को मुश्किल बनाते थे, लेकिन अब आधुनिक संसाधनों और स्थानीय युवाओं की भर्ती से हालात सुधरे हैं।
डीआरजी और बस्तर फाइटर्स में स्थानीय युवाओं की भर्ती ने बड़ा बदलाव किया। इन्हें इलाके की पूरी जानकारी होने से ऑपरेशन ज्यादा प्रभावी हुए।
सुरक्षाबलों ने कम्युनिटी आउटरीच प्रोग्राम के जरिए जनता का भरोसा जीता। बस्तर ओलंपिक और पंडुम जैसे आयोजनों ने लोगों को प्रशासन के करीब लाया।
अब सरकार का फोकस विकास पर है। जिन इलाकों में नक्सल गतिविधियां खत्म हुई हैं, वहां रोजगार, इको-टूरिज्म और बुनियादी सुविधाओं पर काम किया जा रहा है।
आईजी के अनुसार, मई 2025 का ऑपरेशन इस लड़ाई का टर्निंग पॉइंट रहा, जब अबूझमाड़ में नक्सल संगठन के टॉप लीडर बसवराजू का शव बरामद हुआ। इसके बाद संगठन पूरी तरह बिखर गया।
इसके अलावा 2025 में कोरागुट्टा हिल्स में 21 दिन तक चले ऑपरेशन में 31 नक्सलियों को मारा गया और उनकी फैक्ट्री को भी नष्ट किया गया।
आज हालात यह हैं कि बचे हुए नक्सली भी धीरे-धीरे सरेंडर कर रहे हैं। बस्तर अब डर से नहीं, विकास और उम्मीद से पहचाना जाने लगा है।
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